IGKV में बड़ा घोटाला:1 लाख की जगह 3-4 लाख वेतन, नियम विरुद्ध नियुक्ति और पदोन्नति से हर साल 50 करोड़ का अतिरिक्त बोझ
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) में नियुक्तियों और पदोन्नतियों को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। आरोप है कि नियमों को दरकिनार कर अस्थायी और प्रोजेक्ट-बेस्ड कर्मचारियों को सीधे उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों पर बैठाया गया, जिससे विश्वविद्यालय पर हर साल करीब 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है।
मामला कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से जुड़े कर्मचारियों का है, जहां ट्रेनिंग एसोसिएट और जूनियर वैज्ञानिक जैसे अस्थायी पदों पर नियुक्त लोगों को प्रोफेसर, डीन और यहां तक कि कुलपति जैसे अहम पदों पर बैठा दिया गया। दस्तावेजों के मुताबिक, इन कर्मचारियों की मूल नियुक्ति अस्थायी थी, जो न तो विश्वविद्यालय के नियमित संवर्ग में आते हैं और न ही राज्य शासन के अधीन। इसके बावजूद इन्हें बिना प्रशासनिक स्वीकृति के उच्च जिम्मेदारियां सौंप दी गईं।
बता दें कि डॉ. राजेंद्र लाखपाले की नियुक्ति कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) बालाघाट में ट्रेनिंग एसोसिएट के रूप में हुई थी, लेकिन बाद में उन्हें प्रोफेसर बनाया गया और वर्तमान में वे संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय, अंबिकापुर के कुलपति हैं। आरोप है कि उनके प्रमोशन और वेतन निर्धारण में पंचम और षष्ठम वेतन आयोग की गाइडलाइंस का उल्लंघन किया गया। बिना पीएचडी के सेवा शुरू करने के बावजूद उन्हें समय से पहले कई पदोन्नतियां और एडवांस इंक्रीमेंट दिए गए।
वहीं डॉ. रतना नशीने, जो KVK के तहत जूनियर वैज्ञानिक के रूप में नियुक्त हुई थीं, वर्तमान में नारायणपुर कृषि महाविद्यालय की डीन हैं। खास बात यह है कि उनका विषय होम साइंस है, जबकि यह विषय विश्वविद्यालय में संचालित ही नहीं है।
वेतन में भारी विसंगति
जांच में यह भी सामने आया है कि जिन पदों पर 1 से 1.5 लाख रुपये मासिक वेतन तय होना चाहिए था, वहां 3 से 4 लाख रुपये तक का भुगतान किया जा रहा है। यह कथित अनियमितता लंबे समय से जारी है और इससे विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
100 से अधिक नियुक्तियों पर सवाल
सूत्रों के अनुसार, ऐसे 100 से ज्यादा कर्मचारी हैं जिन्हें इसी तरह नियमों को दरकिनार कर उच्च पदों पर समायोजित किया गया है। इससे न केवल वित्तीय अनियमितताएं बढ़ी हैं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं
मामले की शिकायत होने के बाद मंत्री स्तर से कुछ अधिकारियों को हटाने के लिए पत्र भी लिखा गया, लेकिन अब तक न तो कोई ठोस जांच शुरू हुई है और न ही किसी को पद से हटाया गया है। प्रदेश के कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने कहा, यह मामला संज्ञान में है। तकनीकी जानकारी नहीं है, लेकिन अधिकारियों से चर्चा के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
IGKV कुलपति गिरिश चंदेल ने कहा, जैसा आप बता रहे हैं, यह मामला अभी का नहीं, सालों पहले का है। फाइल देखे बिना कुछ नहीं कहा जा सकता है। विश्वविद्यालय में जो भी कार्रवाई हो रही है, वह नियमानुसार और कानून को ध्यान में रखकर की जा रही है।
जानिए आरोपों में घिरे अधिकारियों ने क्या कहा ?
आरोपों में घिरे अधिकारियों ने भी अपने-अपने पक्ष रखे हैं। डॉ. राजेंद्र लाखपाले को उनके पक्ष जानने के लिए तीन बार फोन किया गया, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला।
विवेक त्रिपाठी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, मेरी नियुक्ति सही नियमानुसार हुई है, पांच पदों पर प्रमोशन हुआ है। शासन के लोग इस कमेटी में रहते हैं, गलत होता तो प्रमोशन नहीं मिलता।
डॉ. रतना नशीने से उनका पक्ष जानने के लिए लल्लूराम डॉट कॉम टीम ने कॉल किया। सवाल सुनते ही उन्होंने दो टूक कहा, मेरी नियुक्ति सही है या गलत, यह नियुक्ति करने वालों से पूछिए। यह कहते हुए उन्होंने कॉल डिसकनेक्ट कर दी।
सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम
यह मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, बिना स्वीकृति के अस्थायी कर्मचारियों को उच्च पदों पर कैसे बैठाया गया? वेतन आयोग के नियमों का उल्लंघन कर अतिरिक्त भुगतान किसके निर्देश पर हुआ? और सबसे बड़ा सवाल, इससे प्रभावित हो रही शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेगा? छत्तीसगढ़ की कृषि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े इस बड़े खुलासे ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि जांच आगे बढ़ती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।
