जैविक खेती से कैसे कमाएं लाभ
आधुनिक समय में बढ़ती हुई जनसंख्या के पूर्ति हेतु किसान रासायनिकों जैसे - खाद, खरपतवारनाशी, रोगनाशी तथा किटाणुनाशकों का प्रयोग कर रहें है। सम्भवत: इनके प्रयोग से किसान प्रथम वर्ष अधिक उत्पादन तो प्राप्त कर लेतेे है, परन्तु धीरे-धीरे इनके प्रयोग से मृदा की उर्वरा शक्ति क्षीण होने लगती है और फ सलों की उत्पादन क्षमता भी कम हो जाती है। इन रसायनों की अधिक कीमत होने के कारण खेती की लागत बढ़ जाती है। क्षीण हुई मृदा उर्वरता के कारण इन रसायनों के प्रयोग से भी वें मुनाफा प्राप्त भी नहीं कर पातें है। यहीं नहीं इन रसायनों के प्रयोग से पर्यावरण में भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
अब प्रश्न यह उठता हैं कि किसान जैविक खेती कैसे करें? जैविक खेती करने के लिए कुछ बाते ध्यान रखनी चाहिए।
1.फ सल के लिए बीजों या प्रर्वधन सामग्री का चुनाव- बीजों एवं प्रर्वधन सामग्री खरीदते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि बीज एवं प्रर्वधन सामग्री स्वस्थ हो तथा बीमारीं रहित हों। ये सामग्री हमेशा सुपरिक्षित स्थान से ही खरीदे। हमेशा उच्च गुणवत्ता वाली पौध सामग्री का प्रयोग करें। प्रतिवर्ष नयी सामग्री खरीदने से बेहतर है कि स्वयं स्वस्थ बीज एवं पौध सामग्री का उत्पादन करें। यदि किसी स्थान पर किसी कीट या रोग का प्रकोप हो तो उन स्थानों पर कीट प्रतिरोधी या रोगाणु प्रतिरोधी की उन्नत किस्मों का प्रयोग करना चाहिए।
2.खेत को गर्मियों के समय खाली छोडऩा- मई-जून के महीनों में खेत की 30-35 सेमी. गहरी जुताई करके उन्हें कुछ समय के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से खरपतवार के बीजों तथा मृदा में पाये जाने वाले कीटों को आसानी से सूर्य की गर्मी द्वारा नष्ट किया जा सकता है।
3. फसल चक्र- यह एक महत्वपूर्ण सस्य क्रिया है। किसानों को प्रतिवर्ष एक ही फसल को एक स्थान पर बार-बार नहीं लगाना चाहिए। ऐसा करने से फ सल की गुणवत्ता तथा उत्पादकता पर विपरित प्रभाव पड़ता है। किसान दो या तीन वर्ष के अन्तराल में पुन: उसी फसल को लगा सकते हैं। यदि सही रूप से फ सल चक्र अपनाया जाय तो एक फ सल द्वारा अवशोषित पोषक तत्वों को आसानी से पुन: संचित किया जा सकता है। इसके साथ-साथ हर साल नयी फ सल लगाने से मित्र कीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है। फ सल चक्र में दलहनी फसलों का भी प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि यह मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती है।
4. सहयोगी फसल (टेऊप फसलें)- यदि किसान टमाटर की खेती करना चाहते है तो सून्डी कीट के प्रकोप से फ सल को बचाने के लिए वे गेंदा की फ सल को टमाटर की फसल के चारों ओर लगा सकतें है। ऐसा करने से कीट गेंदे को प्रभावित करेंगें और अन्दर की फ सल सुरक्षित हो जायेगी। जहाँ पर निमेटोड की समस्या हो वहाँ पर भी गेंदे को उगाना चाहिए।
5. खरपतवार नियन्त्रण- यदि किसान छोटे क्षेत्रफ ल में खेती कर रहा है तो हाथ या मशीनों द्वारा आसानी से खरपतवार नियन्त्रित किया जा सकता है। खरपतवार नियंत्रण दूसरा बहुत महत्वपूर्ण तरीका है आच्छादन करना या पलवार बिछाना।
आच्छादन करना या पलवार बिछाना- आच्छादन विभिन्न चीजों जैसे- गोबर की खाद, पुआल, सूखी घास, प्लास्टिक की पॉलिथिन जो रंगो जैसे- लाल, काली, नीले, सिल्वर रंगो में उपलब्ध होती है से किया जा सकता है। कार्बनिक पदार्थों के प्रयोग द्वारा आच्छादन करने से मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, क्योंकि ये धीरे-धीरे विघटित होते है तथा मृदा में पोषक तत्वों को बढ़ाते है।
6. खादों का प्रयोग- जो भी किसान कृषि का व्यवसाय करते है, वे छोटे या बड़े स्तर पर पशुपालन भी करते है। पशुपालन के साथ-साथ वें आसानी से जैविक खाद का निर्माण कर सकते है। इनकें प्रयोग से मृदा की उर्वरा तथा जल अवशोषण क्षमता बढ़ती है तथा मृदा अपरदन भी नियंत्रित रहता है।
गोबर की खाद- गाय एवं भैंस द्वारा उत्सर्जित गोबर तथा मूत्र को पराल के साथ एक गढ्ढे में विघटित करके जो खाद बनायी जाती है। उसे गोबर की खाद कहतें है। उसी प्रकार से किसान बकरी, भेंड़, सुअर एवं मुर्गी की खाद भी आसानी से घर पर तैयार कर सकते है। इन खादों की गुणवता और मात्रा जानवरों के खिलाये जाने वाले चारें तथा गोबर की खाद तैयार करने की विधि पर आधारित होती है। हमेंशा ध्यान रखना चाहिए कि खेत में कच्चा गोबर की खाद का प्रयोग न करें। यदि खेत में कच्चा गोबर का प्रयोग होता है तो करमुला कीट का प्रकोप रहता है जिसके कारण फसल नष्ट हो जाती है। इसलिए अच्छी तरह से सड़ा गोबर ही इस्तेमाल करें।
कम्पोस्ट- कम्पोस्ट बनाने के लिए सब्जियों, फ लों, पत्तियों तथा पौधें के अवशेष तथा जानवरों द्वारा उत्पादित का प्रयोग किया जाता है। कम्पोस्ट बनाने के लिए एक गढ्ढा तैयार करना पड़ता है। जिसमें वें ये पौधों द्वारा उत्पादित कूड़े कचरें को सूक्ष्मजीवों की साहायता से सड़ा सकें।
केचुंआ खाद- इस प्रकार की खाद को तैयार करनें के लिए केंचुओं का प्रयोग किया जाता है। केंचुआ खाद की गुणवत्ता 3 चीजों में निर्भर करती हैं। केंचुआ की प्रजाति, पानी तथा सड़ी हुयी खाद। केंचुआ खाद बनाने के लिए आइसीनिया फ ाइटिडा और यूडरोलिस यूजिनिया केंचुआों का प्रयोग किया जाता है। यें केंचुएं खाद को बहुमूल्य कम्पोस्ट में बदल देतें है।
जैव उर्वरक- यह मिट्टी में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीव होते है जिनको प्रयोगशाला में कल्चर किया जाता है। एजोटोबैक्टर, नाइट्रोजन यौगिकीकरण, फॉस्फोरस घुलनशीलता और कार्बनिक पदार्थो के विघटन द्वारा पौंधों की जड़ों को पोषक तत्वों को आसानी से उपलब्ध कराते है। इसके साथ-साथ ये पादम वृद्धि नियामक हामॉन्स तथा विटामिन्स आदि का निर्माण करते हैं। जैव उर्वरक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ फसल की पैदावार को 10-25 प्रतिशत तक बढ़ा देते है।
पंचगव्य- इसमें नौ उत्पाद होते है गोबर, गौ-मूत्र, दही, दूध, घी, गुड़, केला, नारियल और पानी। इसे बनाने के लिए गोबर तथा घी को अच्छी तरह से मिलाया जाता है और इस मिश्रण को तीन दिन के लिए रख दिया जाता है। जब लगें कि यें मिश्रण पूरी तरह से मिल गया है तो इसे पुन: 15 दिनों के लिए फिर से मिलाया जाता है।
इसके पश्चात अन्य सामग्रीयों को भी डाला जाता है और अगले 30 दिनों के लिए मिश्रण को छोड़ दिया जाता है। पंचगव्य को खुले स्थान पर मिट्टी के बर्तन या कंकरीट के टैंक जिनका मुंह चौड़ा हो उसमें रखना चाहिए। पंचगव्य का प्रयोग जैविक कीटनाशी तथा पौंधो के विकास के लिए अत्यधिक लाभदायक पाया गया हैं।
खाद एवं जैविक उर्वरक बाजार में आसानी से उपलब्ध होते है ये सस्ते एवं पर्यावरण मित्रवत होने के साथ-साथ मृदा की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते है। वें पर्यावरण को प्रदुषित होने से बचाते है।
7. कीट एवं रोग नियन्त्रण-
1. फसल की किस्मों का चुनाव करते समय रोग एवं कीट प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का प्रयोग करें।
2. रोग एवं कीटों को नियन्त्रित करने के लिए समय-समय पर खेत में भ्रमण करतें रहना चाहिए। ताकि प्रारम्भिक अवस्था में हीे उन्हे नियन्त्रित किया जा सकें।
3. यदि किसान छोटे क्षेत्रफल में खेती कर रहा है तो हाथों द्वारा कीट के अण्डों, लार्वा तथा प्यूपा को इक_ा करके मार देना चाहिए। ताकि संक्रमण न फैलें।
4. कुछ कीट प्रकाश की तरफ आकर्षित होते है। उनकी संख्या को लाईट ट्रैप लगवा कर नियन्त्रित किया जा सकता है।
5. उसी प्रकार कुछ कीट रंगो की तरफ आकर्षित होते है। इन कीटों को नियन्त्रित करने के लिए रंगीन चिपचिपे ट्रैप का प्रयोग करना चाहिए। जैसे- थ्रिप्स के लिए नीले रंग का तथा एफिड के लिए पीले रंग का ट्रैप प्रयोग किया जाता है। किसान इन्हे घर पर आसानी से तैयार कर सकते है। एक लकड़ी या कार्ड बोर्ड के गत्ते में पीले/नीले रंग का पेंट या चार्ट लगा / चिपका दें। उस चार्ट/ पेन्ट के उपर पेट्रोलियम जैली या वानस्पतिक तेल या चिपचिपें पदार्थ की एक परत लगा दें। और इस ट्रैप को खेत के एक मीटर के दायरे पर लगा देना चाहिए। ऐसा करने से कीट उसकी तरफ आकर्षित होके उस पर चिपककर मर जातें है। हमेंशा ध्यान रखना चाहिए कि खेतो की सीमा के पास नहीं लगाये।
6. फिरोमोन ट्रैप का प्रयोग कीटों की आबादी को नियन्त्रित करने में बहुत सहायक होता है। इस ट्रैप से भिनी-भिनी सुगन्ध निकलती है। जो नर कीटों को भ्रमित करके अपनी ओर आकर्षित करती है जिसकें कारण वे इस ट्रैप में प्रवेश कर जाते है और मर जाते है।
7. इन सबकें अतिरिक्त प्राकृतिक रूप से निर्मित कीटनाशकों जैसे- नीम, प्याज, मिर्च तथा लहसुन आदि के घोल द्वारा छिड़काव करना चाहिए। प्राकृतिक कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यकता से अधिक नहीं करना चाहिए अर्थात उचित मात्रा में इनका छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव से पूर्व जैविक मानकों का अध्ययन अवश्य करें।
निष्कर्ष: जो किसान पहले से रासायनिक खेती कर रहें है वे जैविक खेती अपना के एकीकृत प्रबंधन कर सकते है। ऐसा करने से वे कम लागत में अधिक गुणवत्ता वाले खाद्यान्नों को उत्पादन कर सकते है। किसान इन तरिको को अपना कर गुणवत्ता के साथ-साथ अधिकतम लाभ कमा सकतें है। इसकें साथ-साथ जैविक खेती द्वारा पारस्थितिकी तन्त्र को संरक्षण तथा संतुलन असानी से बनाया जा सकता है।
