लाभकारी है लौकी की जैविक खेती - CGKIRAN

लाभकारी है लौकी की जैविक खेती

लौकी, कद्दुवर्गीय सब्जियों मे प्रमुख स्थान रखता है तथा यह सबसे पुरानी फसलों मे से एक है जिसे मनुष्यो द्वारा पिछले 14000 सालो मे उपयोग किया जा रहा है। कद्दुवर्गीय मे लौकी एकमात्र ऐसी सब्जी है जिसके फूलो का रंग सफेद होता है जो रात मे खिलती है अत: इसे '' सफेद फूल वाली सब्जी'' भी कहा जाता है। इसके हरे फ लो से सब्जियो के अलावा कोफते, आचार, खीर, मिठाईयंा
, रायता आदि बनाये जाते है। औषधिय गुणो से युक्त व सुपाच्य होने के कारण मनुष्य जीवन मे इसका बहुत अधिम महत्व है। 

जलवायु:- नम तथा गर्म जलवायु लौकी की खेती के लिये उपयुक्त मानी जाती है। पाला  इस फसल के लिये हानिकारक है। तथा छाव मे इसकी खेती नहीं की जा सकती । इसके अकुंरण हेतु मृदा तापमान 18-22 अंश होना चाहिये। अधिक वर्षा के साथ यदि लबें समय तक बादल छाया रहे तो बिमारियो एंव कीटो के प्रकोप की संभावना बढ जाती है। 

उन्नत किस्मे:- 

1. पूसा समर प्रोलीफिक लौंग:- यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। इसके फ लों की लम्बंाई 40-45 से.मी तथा मोटाई 20-25 से.मी. होती है। यह 60 दिनो मे तैयार हो जाती है। 250 क्विटंल प्रति हेैक्टेयर उपज प्राप्त होती है। 

2. पूसा नवीन:- इस किस्म के फ लो की लम्बंाई 25-30 से.मी, मोटाई 15-20 से.मी तथा भार लगभग 800 कि.ग्रा होता है। यह किस्म 55 दिनो मे तैयार हो जाती है। 275 क्विटंल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। 

3. अर्का बहार:- इस किस्म का विकास भारतीय उधानिकी अनुसंधान संस्थान बैंगलोर द्वारा किया गया है। फ लो की लम्ब्ंााई 43 से.मी, मोटाई 26 से. मी तथा भार 1 कि.ग्रा होता है। 400- 500 क्विटंल प्रति हेक्टेयर उपज देने वाली यह किस्म 115-120 दिनो मे तैयार हो जाती है।

4. पूसा संदेश:- यह गोलाकार होता है। जिसका भाग लगभग 500 ग्राम होता है। यह किस्म 55 दिनो मे खाने युक्त तैयार हो जाता है। इसका उपज 270 क्विंटल प्रति हेैक्टेयार है। 

5. पूसा हाइब्रिड 3:- यह किस्म भारतीय कृषि अनुसंधान नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। फ लो की लम्बाई 35-40 से.मी, मोटाई 15-30 से.म ी तथा भार 1-2 किस्म तक होता है जो कि 55 दिनो मे तैयार हो जाती है उपज 425 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक पाया जाता है। 

6. पूसा मेघदूल:-  यह संकर प्रजाति पूसा समर प्रोलोफिक लौंग तथा 1-2 से प्राप्त हुई है इसके फ लो का रंग हल्का हरा होता है। उपज 250 क्विंटल प्रति हैक्टयर होता है। 

7. पूसा मंजिरी:- यह संकर प्रजाति पूसा समर प्रोलोफि क राउंड तथा 1-11 से मिलकर प्राप्त हुआ है। इसका फल गोलाकार तथा हल्के हरे रंग का होता है। उपज 253 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होता है। 

भूमि:- इसे विभिन्न प्रकार की भूमियों मे उगाया जा सकता  हैै। किंतु उचित जलधारण क्षमता वाली जिवांशंयुक्त हल्की दोमट भूति इसकी खेती के लिये अच्छी होती है। नदियों के किनारे वाली भूमि इसकी खेती के लिये उपयुक्त रहती है। कुछ अम्लीय (6-7) भूमि मे इसकी खेती की जा सकती है।

 खेती की तैयारी:- पहले खेत को पलेवा करे जब भूति जुताई योग्य हो जाए तब उसकी जुताई 02 बार मिटटी पलटने वाले हल से करे इसके बाद 02 बार कल्टीवेटर चलाए और प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाये ।

बीच बुवाई व बीज मात्रा:- 

ग्रीष्म कालीन फसल - फरवरी- मार्च 

वर्षा कालीन फसल - जून - जुलाई 

शरद कालीन फसल - अक्टूबर - नवम्बर 

4-5 कि.ग्रा बीज एक हैक्टयेर के लिये पर्याप्त होती है। एक स्थान पर 2-3 बीज 2 से.मी की गहराई पर बोने चाहीये। बीज को बोने से पूर्व 12-24 घण्टे तक पानी मे भिंगो देना चाहिये इससे अंकुरण जल्दी  एंव अच्छा होता है। 

बुवाई की विधि:-  बुवाई 2 प्रकार से की जाती है। 

1. सीधे बीज द्वारा 2. पौध रोपण द्वारा 

खेत की मिटटी को 2-3 जुताईयो कर भुरभुरी कर ले । 45 से0 मी0 चौडी तथा 30-40 से0 मी गहरी नालियो पूर्व से पश्चिम की ओर बना ले। । नाली से नाली की दूरी 2 मीटर रखे । पौधो की रोपाई तैयार नालियो के किनारे (उत्तरी किनारे ) पर 75-100 से. मी की दूरी पर करे। 

नाली विधि से खाद पानी सिचाई तथा निराई -गुडाई पर आने जाने वाले खर्च पर काफी बचत होने के साथ साथ अधिक पेैदावार स्वास्थ्य फलो क ेसाथ पैदा होती है। 

खाद एवं उर्वक:- 

लौकी की फ सल मे अच्छी पैदावार लेने के लिये उसमे आर्गेनिक खाद , कम्पोस्ट खाद का होना अनिवार्य है इसके लिये एक है भूमि मे लगभग 40-50 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सडी गली हुई खाद 50 किलो नीम की खली इसको अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण तैयार कर खेत मे बोने के पूर्व इस मिश्रण को खेत मे समान मात्रा मे बिखेर दे इसके बाद खेत की अच्छे से जुताई्र करें, खेत तैयार कर बुताई करे । जब फसल 25-30 दिन की हो जाए  तब नीम का काढ़ा को गौ मूत्र के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर छिड़काव करें या 25-30 टन सडी हई गोबर की या कम्पेास्ट खाद खेत मे बुवाई से 25-30 दिन पहले या बुवाई से पूर्व नालियो मे 50 कि.ग्रा. डी0 ए0पी0 50 कि0ग्रा0 न्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जमीन मे मिलाए । बाकी नत्रजन 30 कि.ग्रा. यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व इतनी ही मात्रा 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन की अवस्था में डालें। 

सिंचाई:- लौकी की फ सल मे मिट्टी व मौसम के अनुसार 07-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए सिंचाई करते समय पानी सीधे पोैधे के तने या जड के सम्पर्क मे न आए  तथा फ लो को भी पानी के सम्पर्क से बचाना चाहिए जिससे फ ल खराब न हो 

प्रमुख कीट एंव रोकथाम:- लौकी की फसल कों कई प्रकार के कीट नुकसान पहुचाते हैै। 

लाल कद्दु भृंग:- पौधो मे 2 पत्तियंा निकलने पर इसका प्रकोप शुरू हो जाता है। यह कीट पत्तियो और फ लो को खाता है। 

फल मक्खी, चेंपा व माइटस की रोकथाम के लिये मैलाथियान 1 मि.ली प्रति लीटर पानी का छिडकाव करे।

प्रमुख रोग एंव उनका प्रबंधन:- 

इस फसल की प्रमुख बीमारियो मे फफंूसी चूर्ण रोग, एन्थ्रेक्नोज,फ्यूजेरियम विल्ट और वायरस की बीमारियां है। फफूंदी से लगने वाले रोगो को फफूंदीनाशक जैसे मैंकोजेब 0.25प्रतिशत का छिड़काव करे। 

उपज:- 

उन्न्त तौर तरीको से खेती करने पर प्रति हेक्टेयर भूमि से 150-200 क्विंटल उपज प्राप्त होती है।    

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