बलबीर की कला का सफर- बरगद के पत्तों से शुरू हुआ,आज पूरी दुनिया तक पहुंचा - CGKIRAN

बलबीर की कला का सफर- बरगद के पत्तों से शुरू हुआ,आज पूरी दुनिया तक पहुंचा


छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय कला को वैश्विक पहचान दिलाने की मुहिम में कबीरधाम जिले के ग्राम गिरधारीकापा के युवा चित्रकार बलबीर प्रसाद विश्वकर्मा एक नई मिसाल बनकर उभरे हैं। बरगद के पत्तों पर आकृतियां उकेरने से शुरू हुआ उनका कला सफर आज देश की प्रतिष्ठित आर्ट गैलरियों से होकर लंदन तक पहुंच चुका है। उनकी चित्रकला केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामाजिक जीवन का जीवंत दस्तावेज है।

बलबीर का मानना है कि जनजातीय कला केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति भी है। यही सोच उन्हें परंपरागत चित्रकला को आधुनिक मंचों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करती है। उनका सपना छत्तीसगढ़ में एक विश्वस्तरीय जनजातीय आर्ट गैलरी स्थापित करने का है, जहां देश-दुनिया की जनजाती कलाओं का संगम देखने को मिले और स्थानीय कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय मंच प्राप्त हो।

बरगद की चौड़ी पत्तियां पहली कैनवास बनीं: कला से उनका लगाव बचपन में बड़े भाई प्रभात विश्वकर्मा की वजह से हुआ। गांव के तालाब किनारे के बरगद के पेड़ की चौड़ी पत्तियां उनकी पहली कैनवास बनीं। इन्हीं पत्तों पर आंखों, चेहरों और पशु-पक्षियों की आकृतियां बनाते-बनाते उन्होंने अपनी कला को निखारा और उसे जीवन का उद्देश्य बना लिया।

नि:शुल्क प्रशिक्षण दे रहे: आज बलबीर भोरमदेव आदिवासी चितेरे फाउंडेशन के माध्यम से बच्चों और युवाओं को जनजातीय चित्रकला का निःशुल्क प्रशिक्षण दे रहे हैं। स्कूलों, शासकीय भवनों और सार्वजनिक स्थलों की दीवारों पर पारंपरिक चित्रांकन कर वे लोक संस्कृति को जन-जन तक पहुंचा रहे हैं। उनका लक्ष्य इस वर्ष लगभग दो हजार युवाओं को प्रशिक्षित कर पारंपरिक कला के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना है।

लंदन में लग चुकी है प्रदर्शनी: उनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनियां दिल्ली, भारत भवन भोपाल, रायपुर, हरियाणा, राजस्थान सहित लंदन तक में आयोजित हो चुकी हैं। वर्ष 2016 में विमुद्रीकरण विषय पर बनाई गई पेंटिंग को राष्ट्रीय सम्मान मिला। उन्हें राष्ट्रीय सेवा सम्मान, बेस्ट आर्टिस्ट अवॉर्ड, हिंदी रत्न सम्मान, मदर टेरेसा सम्मान तथा भोरमदेव सेंचुरी तितली सम्मान-2024 सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

संदेश: लोक और जनजातीय कला केवल हमारी विरासत नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान है। यदि युवाओं को प्रशिक्षण, मंच और बाजार मिले तो यही कला हजारों परिवारों की आजीविका बन सकती है और दुनिया में भारत की नई पहचान स्थापित कर सकती है।

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