कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा का नया विकल्प : नैनो उर्वरक, नैनो यूरिया और नैनो डीएपी बन रहे किसानों की नई पसंद
खेती में बढ़ती लागत, मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से पैदा हो रही चुनौतियों के बीच अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए एक उपयोगी और लोकप्रिय विकल्प बन गई है। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का उपयोग खेती में लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए सबसे आधुनिक तकनीक है। ये पारंपरिक खादों का एक अत्यधिक कुशल, पर्यावरण के अनुकूल और सस्ता विकल्प हैं, जो फसल के पोषण को सीधा पौधों तक पहुंचाते हैं। पारंपरिक खादों का बहुत बड़ा हिस्सा मिट्टी में बेकार चला जाता है। वहीं नैनो खाद पौधों को सीधा पोषण देते हैं, जिससे पोषक तत्वों का उपयोग 80 प्रतिशत से ज्यादा हो जाता है। रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से इनका उपयोग करें तो इससे खेती की लागत कम करने, उत्पादन बेहतर बनाने और मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
कृषि क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक खाद के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसके अलावा रासायनिक अवशेष कम होते हैं।भूजल प्रदूषण घटता है।मिट्टी की जैविक सक्रियता बेहतर बनी रहती है।पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है।इसी कारण वैज्ञानिक खेती में अब संतुलित उर्वरक उपयोग पर अधिक जोर दिया जा रहा है । विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में खेती को टिकाऊ और लाभकारी बनाए रखने के लिए उर्वरकों के उपयोग के तौर-तरीकों में बदलाव जरूरी होगा। यही कारण है कि अब किसानों के बीच नैनो उर्वरकों को लेकर रुचि बढ़ रही है।
छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकांश धान उत्पादक क्षेत्रों में सामान्यतः प्रति एकड़ 2 से 3 बोरी यूरिया और 1 बोरी डीएपी का उपयोग किया जाता है। मौजूदा कीमतों के अनुसार एक बोरी यूरिया की कीमत लगभग 270 रुपये और एक बोरी डीएपी की कीमत लगभग 1350 रुपये है। इस प्रकार केवल यूरिया और डीएपी पर प्रति एकड़ करीब 1900 से 2200 रुपये तक खर्च हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल का प्रभाव लगभग एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर माना जाता है। फसल में दो चरणों में छिड़काव के जरिए पारंपरिक यूरिया की जरूरत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यदि किसान 2 बोरी ठोस यूरिया की जगह 2 बोतल नैनो यूरिया का उपयोग करते हैं तो अनुमानित खर्च 100 रुपये प्रति एकड़ बचत होती है। दो बोरी पारंपरिक यूरिया का मूल्य लगभग 540 रुपये है। इसके स्थान पर 2 बोतल नैनो यूरिया| लगभग 450-500 में आता है। यानि सीधे खाद लागत में बचत के साथ-साथ परिवहन, भंडारण और मजदूरी खर्च में भी कमी आती है।
इसी प्रकार कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि 50 किलो डीएपी की पूरी मात्रा उपयोग करने के बजाय यदि किसान 25 किलो डीएपी के साथ 500 मिली नैनो डीएपी का उपयोग करें तो प्रति एकड़ लगभग 75 से 150 रुपये तक की बचत होती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पारंपरिक यूरिया का बड़ा हिस्सा मिट्टी, पानी और वातावरण में नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत नैनो यूरिया के सूक्ष्म कण सीधे पौधों द्वारा तेजी से अवशोषित किए जाते हैं। इससे पौधों को संतुलित पोषण मिलता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक संतुलित उपयोग की स्थिति में इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आए है।फसल की बढ़वार बेहतर होती है। पौधों की हरियाली लंबे समय तक बनी रहती है। दानों का भराव मजबूत होता है।उत्पादन की गुणवत्ता सुधरती है। उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ती है। कई कृषि परीक्षणों में 5 से 8 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि के संकेत भी मिले हैं।
वैज्ञानिक सलाह के अनुसार संतुलित रूप से नैनो उर्वरकों का उपयोग बढ़ाते हैं तोआयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी है।विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। देश में उर्वरक उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। उत्पादन इकाइयों में रोजगार बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैज्ञानिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और आधुनिक तकनीकों का समन्वय ही खेती को अधिक लाभकारी बनाएगा। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प माना जा रहा है, जो कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा तीनों मोर्चों पर किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
