'ग्रामीणों का सोना' महुआ चंद दिन की कमाई, पूरे साल का सहारा - CGKIRAN

'ग्रामीणों का सोना' महुआ चंद दिन की कमाई, पूरे साल का सहारा


 छत्तीसगढ़ के जंगल और ग्रामीण क्षेत्र इन दिनों महुआ की खुशबू से सराबोर हैं. प्राकृतिक सुंदरता से घिरे भरतपुर विकासखंड के जंगलों में भी महुआ के पेड़ों की भरमार है, जो न सिर्फ पर्यावरण की खूबसूरती बढ़ाते हैं, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय के लिए आजीविका का सबसे बड़ा सहारा भी बने हुए हैं. हर साल की तरह इस वर्ष भी महुआ सीजन ने ग्रामीणों के जीवन में रौनक और आर्थिक उम्मीदें लेकर दस्तक दी है.भरतपुर के ग्रामीण और विशेष रूप से आदिवासी परिवार महुआ पर पूरी तरह निर्भर हैं. महुआ का फूल उनके लिए सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि सालभर की आजीविका का आधार है. जैसे ही महुआ गिरना शुरू होता है, गांवों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है. सुबह के 4 बजे से ही महिलाएं, पुरुष और बच्चे जंगल की ओर निकल पड़ते हैं. पूरा दिन महुआ बीनने में बीतता है और शाम को वे इसे घर लाकर सुखाते हैं.ग्रामीण जंगल से महुआ बीनने के बाद इसे सूखाते हैं. इस महुआ का उपयोग घर में खाने में भी किया जाता है. साथ-साथ बाजार में बेचकर दैनिक जरूरतों जैसे सब्जी-भाजी, राशन और कई जरूरी चीजें ग्रामीण खरीदते हैं. वहीं इसका सबसे ज्यादा उपयोग पारंपरिक पेय देसी दारू बनाने में भी होता है. यही वजह है कि महुआ सीजन को ग्रामीण “कमाई का मौसम” भी कहते हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महुआ किसी रीढ़ की हड्डी से कम नहीं है इसके अलावा महुआ का फल भी उपयोग में आता है और इसे आयुर्वेदिक दवाएं बनाई जाती है

इस साल महुआ की पैदावार अच्छी है. ग्रामीण सुबह से शाम तक जंगल में ही रहते हैं और वहीं भोजन भी करते हैं. शादी-विवाह के सीजन में महुआ की मांग बढ़ जाती है, जिससे व्यापारियों का कारोबार तेज होता है. वर्तमान में महुआ का बाजार भाव करीब 45 रुपये प्रति किलो है.

वन परिक्षेत्राधिकारी चरणकेश्वर सिंह के अनुसार, महुआ का पेड़ किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है. एक पेड़ से लगभग 10 क्विंटल तक महुआ फूल प्राप्त होता है, जिससे औसतन 40,000 रुपये तक की आय होती है. इसके अलावा महुआ फल (डोरी) से करीब 2 क्विंटल उत्पादन होता है, जिससे लगभग 10,000 रुपये की अतिरिक्त आय मिलती है.महुआ फल का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में भी किया जाता है. वर्ष 2025 में 200 महुआ पौधे लगाए गए थे, जबकि 2026 में विभिन्न गोठानों के माध्यम से लगभग 12,000 पौधों का रोपण किया गया है.- चरणकेश्वर सिंह, वन परिक्षेत्र अधिकारी

महुआ न सिर्फ एक पेड़ है, बल्कि भरतपुर के हजारों परिवारों की जीवनरेखा है. यह जंगल और जनजातीय जीवन के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम करता है. महुआ के जरिए जहां ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, वहीं यह परंपरा और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को भी दर्शाता है.

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