भोरमदेव अभयारण्य में बर्ड हियरिंग प्रोजेक्ट - अब ट्रैप कैमरे के साथ होगी वन्यजीवों की पहचान
प्रसिद्ध भोरमदेव अभयारण्य में वन्यजीवों और पक्षियों की निगरानी अब आधुनिक तकनीक के जरिए और बेहतर होने जा रही है. अभ्यारण्य में वन्यजीवों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियों का पता लगाने के लिए अब ‘बर्ड हियरिंग’ तकनीक का इस्तेमाल करने की तैयारी की जा रही है. इसके लिए वन विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं.
अब तक भोरमदेव अभयारण्य में वन्यजीवों की निगरानी और उनकी मौजूदगी का पता लगाने के लिए मुख्य रूप से ट्रैप कैमरों का इस्तेमाल किया जाता रहा है. ट्रैप कैमरों के जरिए वन्यजीवों की तस्वीरें और उनकी गतिविधियां रिकॉर्ड की जाती हैं. वहीं, बर्ड हियरिंग तकनीक के जरिए जंगल में मौजूद जीवों की आवाज भी दर्ज की जा सकेगी.
अभयारण्य के कोर एरिया से लेकर बफर जोन तक चिन्हित स्थानों पर विशेष हियरिंग डिवाइस लगाए जाएंगे. ये डिवाइस जंगल में मौजूद पक्षियों और वन्यजीवों की आवाज को रिकॉर्ड और कैप्चर करेंगे. रिकॉर्ड की गई आवाजों के विश्लेषण से वन विभाग को अलग-अलग प्रजातियों की पहचान करने के साथ-साथ उनकी मौजूदगी वाले क्षेत्रों का पता लगाने में मदद मिलेगी.
वन विभाग का मानना है कि कैमरा ट्रैप और ऑडियो मॉनिटरिंग को एक साथ इस्तेमाल करने से अभ्यारण्य की जैव विविधता की बेहतर जानकारी मिल सकेगी. इससे दुर्लभ पक्षियों और वन्यजीवों की पहचान, उनकी गतिविधियों की निगरानी और संरक्षण की योजनाएं तैयार करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है. भोरमदेव अभयारण्य अपनी समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों के लिए जाना जाता है. नई तकनीक के इस्तेमाल से जंगल की निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
खासकर रात को पक्षियों और दूसरे जीव जंतुओं की आवाजें सुनने के लिए बर्ड हियरिंग प्रोजेक्ट स्वीकृत किया है. इसके लिए बाहर से डिवासेस मंगाए जा रहे हैं, उसे लगाएंगे. इससे हमारे पास पक्षियों और दूसरे जानवरों की प्रजातियां की जो चेकलिस्ट है, उससे मिलाया जाएगा. इसके अलावा चेकलिस्ट में क्या इजाफा हो रहा है ये पता चलेगा- निखिल अग्रवाल, डीएफओ, कवर्धा
डीएफओ ने ये भी बताया कि बर्ड हियरिंग प्रोजेक्ट से ये भी पता चलेगा कि मानवीयकरण और प्राकृतिक कारणों से पक्षियों जानवरों पर जो प्रभाव पड़ रहा है, उससे उनकी प्रवृत्ति पर क्या असर पड़ा है. बर्ड हियरिंग पक्षियों और जानवरों की वाइस कैप्चर कर उनके बारे में बतायगा. अधिकारी ने बताया कि फिलहाल बर्ड्स पर फोकस है. क्योंकि उनके पास बर्ड्स का डेटाबेस है, उन्हें आइडेंटीफाई कर सकते हैं. इसके अलावा सभी छोटे जानवर, इनसेक्ट्स भी इसमें शामिल किए गए है.
भोरमदेव अभयारण्य 351 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल है. जिस संस्था को हमने काम दिया है, डिवाइस आने के बाद उनसे बात कर ग्रिड बनाया जाएगा. सर्वे करने के बाद क्षेत्रफल के अनुसार ग्रिड कितना बड़ा होना चाहिए ये देखकर बर्ड ईयरिंग डिवाइस लगाया जाएगा
