किसान बिना खाद और कम लागत में कर रहे सेहतमंद खेती - पारंपरिक देसी कोहड़ा किस्म का संरक्षण - CGKIRAN

किसान बिना खाद और कम लागत में कर रहे सेहतमंद खेती - पारंपरिक देसी कोहड़ा किस्म का संरक्षण


छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी पारंपरिक तरीके से कोहड़े की खेती की जाती है. यहां के ग्रामीण अपने मकान की छत पर कोहड़े की बेल उगाते हैं. ऐसा करने से खेती में लागत काफी कम आती है. इसके साथ ही फल जमीन पर गिरकर सड़ने से भी बच जाते हैं.

सरगुजा जिले के बरिमा गांव के निवासी यादव ने इस परंपरा के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि यह कोहड़ा उनकी पारंपरिक देसी किस्म है. आजकल ज्यादातर किसान हाइब्रिड किस्मों की खेती करते हैं. इसके विपरीत, बरिमा गांव के कुछ ग्रामीण पुरानी देसी किस्मों को संरक्षित रखे हुए हैं.इसी परंपरा के तहत वे कोहड़े की बेल को छत पर चढ़ाकर खेती करते हैं.

कोहड़े को जमीन पर रखने के बजाय छत पर रखने से फल सुरक्षित रहता है. यदि फल गीली जमीन के संपर्क में आता है, तो उसके सड़ने और दाग लगने की संभावना रहती है. छत पर बेल होने से कोहड़ा हवा में लटका रहता है. इससे फल का आकार भी अच्छा बना रहता है.

यादव बताते हैं कि वे इस देसी कोहड़े की खेती जुलाई महीने में शुरू करते हैं. सितंबर के आसपास बेल में फल आने लगते हैं। फल लगने के बाद किसी विशेष खाद या बड़े खर्च की आवश्यकता नहीं होती. केवल बेल और फल की देखरेख करनी होती है, ताकि फल जमीन पर न गिरे और सुरक्षित रहे.

इस खेती की खास बात इसकी कम लागत है. यादव के अनुसार, कोहड़े की खेती में खाद का खर्च नहीं होता. मुख्य लागत किसान की मेहनत और देखरेख है. इसके बीज भी किसान अक्सर अपने पास सुरक्षित रखते हैं. यदि बीज उपलब्ध न हों तो पड़ोसियों से लेकर खेती कर लेते हैं. यादव बताते हैं कि इस देसी कोहड़े का खास महत्व दिवाली के बाद आता है. दिवाली के बाद आने वाले एकादशी पर्व पर इस देसी कोहड़े का धार्मिक महत्व होता है.

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