अबूझमाड़ के जंगलों से बाजार तक पहुंचा 'डेंगूर फूटू', बारिश के सीजन में ग्रामीण आजीविका का बड़ा स्त्रोत - CGKIRAN

अबूझमाड़ के जंगलों से बाजार तक पहुंचा 'डेंगूर फूटू', बारिश के सीजन में ग्रामीण आजीविका का बड़ा स्त्रोत


नारायणपुर में डेंगूर फूटू पूरे मार्केट की शान बना हुआ है. पोषण से भरपूर इस दुर्लभ वनोपज की आवक बढ़ने से बाजार गुलजार है. दरअसल छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला अपनी समृद्ध वन संपदा और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है. बारिश के मौसम में यहां डेंगूर फूटू (देशी जंगली मशरूम) मिलता है. अबूझमाड़ के जंगलों से निकलकर नारायणपुर के बाजार तक पहुंचने वाला डेंगूर फूटू केवल एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि जंगल, आदिवासी जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का जीवंत प्रतीक है. सीमित समय के लिए मिलने वाला यह जंगली मशरूम स्वाद और पोषण दोनों का अनूठा संगम है.यदि आदिवासी संग्रहकर्ताओं को उचित बाजार, बेहतर मूल्य और व्यवस्थित विपणन की सुविधा मिले, तो यह वनोपज हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ बस्तर की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला सकती है.अबूझमाड़ और आसपास के वन क्षेत्रों से आदिवासी ग्रामीण इस मौसमी वनोपज को इकट्ठा कर नारायणपुर के जयस्तंभ चौक स्थित डेली मार्केट पहुंच रहे हैं. बाजार में डेंगूर फूटू की अच्छी आवक रही, जिससे खरीदारों की भीड़ उमड़ पड़ी. 

डेंगूर फूटू क्या है

डेंगूर फूटू एक प्राकृतिक जंगली मशरूम है, जो मुख्य रूप से दीमक के पुराने टीले (बांबी) के आसपास स्वतः उगता है. पहली अच्छी बारिश, वातावरण में बढ़ी नमी और जमीन के भीतर की गर्मी एक आदर्श वातावरण तैयार करते हैं और बादलों की गड़गड़ाहट के बाद यह जमीन से बाहर निकलता है. इसका जीवनकाल बहुत कम होता है और यह केवल कुछ सप्ताह तक ही उपलब्ध रहता है.

वैज्ञानिक रूप से यह टर्मिटोमाइसिस (Termitomyces) समूह का खाद्य मशरूम माना जाता है, जो दीमकों के साथ सहजीवी संबंध में विकसित होता है. यह प्रोटीन, फाइबर, खनिज और कई आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर माना जाता है और खाने में बेहद स्वादिष्ट होता है.

यह एक प्रकार का फंगस है, बारिश में तापमान अनुकूल होने पर मिट्टी से बाहर आते हैं. यह बहुत लाभकारी है. इसमें प्रोटिन रहता है, जो सेहत के लिए फायदेमंद है. इसमें फाइबर, विटामिन भी होता है. यह एंटीऑक्सिडेंट है. आयरन, कैल्शियम भी होता है. यह शरीर से सूजन को कम करता है. इम्यूनिटी बढ़ाने में मदद करता है. यह स्वाद में भी अच्छा होता है, इसलिए लोग बड़े चाव से खाते हैं. इसे सूखाकर रख सकते हैं. हमारे देश में बहुत प्रकार के मशरूम हैं. कुछ खाने वाले और कुछ जहरीले मशरूम भी होते हैं. ग्रामीणों को यह ध्यान रखना है कि जहरीले मशरूम को न खाएं. अच्छे से पहचान कर फूटू खाना चाहिए-डॉ. द्वीवेंदु दास, कृषि वैज्ञानिक एवं प्रमुख कृषि विज्ञान केंद्र नारायणपुर

नारायणपुर के बाजारों में देसी मशरूम

नारायणपुर के जयस्तंभ चौक स्थित डेली मार्केट में इन दिनों डेंगूर फूटू की भरपूर आवक देखने को मिल रही है. अबूझमाड़, ओरछा, कुतुल और भारंडा, रेमावंड, बेनूर एवं अन्य आसपास के वन क्षेत्रों से पहुंचे आदिवासी ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों से संग्रहित मशरूम लेकर बाजार पहुंच रहे हैं. स्थानीय बाजार में इसकी बिक्री 150 से 200 रुपये प्रति किलो तक अथवा 40 से 50 रुपये प्रति जुड़ी (20-30 मशरूम) के हिसाब से हो रही है. सीमित समय तक उपलब्ध रहने और अनूठे स्वाद के कारण खरीदार भी बड़ी संख्या में इसे खरीद रहे हैं.

मार्केट में ज्यादातर लोग खरीद रहे डेंगूर फूटू

स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, नारायणपुर और बस्तर से निकलने वाला यह मशरूम राज्य के अन्य शहरों के अलावा मध्यप्रदेश और ओडिशा तक भी पहुंचता है. बड़े शहरों और विशेष बाजारों में इसकी कीमत कई गुना अधिक हो जाती है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां नारायणपुर में यह 150-200 रुपये किलो तक उपलब्ध है, वहीं महानगरों में गुणवत्ता और उपलब्धता के आधार पर इसकी कीमत हजार रुपये प्रति किलो से भी ज्यादा पहुंच सकती है.

पोषण का खजाना माना जाता है डेंगूर फूटू

विशेषज्ञों के अनुसार टर्मिटोमाइसिस प्रजाति के जंगली मशरूम प्रोटीन, आहार फाइबर, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम और अन्य आवश्यक खनिजों के अच्छे स्रोत माने जाते हैं. इनमें एंटीऑक्सीडेंट और जैव सक्रिय तत्व भी पाए जाते हैं, जिन पर विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययन किए जा चुके हैं. इसी कारण यह केवल स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि पोषण के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण वनोपज माना जाता है.

बिचौलिए के कारण आदिवासी ग्रामीणों को नहीं मिल पाती अच्छी कीमत

अबूझमाड़ और बस्तर अंचल के अनेक आदिवासी परिवार मानसून के दौरान जंगलों से डेंगूर फूटू का संग्रह कर बाजारों में बेचते हैं. इससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है. हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि कई बार स्थानीय बिचौलिए कम कीमत पर मशरूम खरीद लेते हैं और बाद में ऊंचे दामों पर बेचते हैं. यदि संग्रहकर्ताओं को सीधे बाजार उपलब्ध कराया जाए तो उन्हें उनकी मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकता है.

डेंगूर फूटू आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने का माध्यम

बस्तर क्षेत्र पर हुए अध्ययनों में भी डेंगूर फूटू को स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़ा महत्वपूर्ण वन उत्पाद बताया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डेंगूर फूटू के संग्रह, संरक्षण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और विपणन की संगठित व्यवस्था विकसित की जाए तो यह बस्तर और अबूझमाड़ के आदिवासी परिवारों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है. वनोपज आधारित मूल्य संवर्धन, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और लघु वनोपज समितियों के माध्यम से इसकी बेहतर मार्केटिंग की संभावनाएं भी मौजूद हैं.


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