ग्रीष्मकालीन धान के बदले दलहन और मक्का उत्पादन को अपना रहे किसान
जिले में 634 हेक्टेयर लक्ष्य के विरुद्ध 209 हेक्टेयर में वैकल्पिक फसलों की बुवाई
कम पानी और कम लागत में बेहतर मुनाफे की ओर बढ़ रहे किसान
भू-जल संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य सुधार में फसल चक्र परिवर्तन है अनिवार्य
जिले में श्फसल विविधीकरण' के अंतर्गत किसान अब पारंपरिक धान की खेती छोड़कर लाभप्रद वैकल्पिक फसलों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। जिले के किसानों ने जल संरक्षण और बेहतर आय की दिशा में कदम बढ़ाते हुए ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर रागी, मूंगफली, उड़द, मूंग और मक्का जैसी फसलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। इस नई पहल से न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है, बल्कि गिरते भू-जल स्तर को रोकने में भी मदद मिल रही है।
लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम
कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले में इस वर्ष ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए 634 हेक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। विभाग के सतत मार्गदर्शन और जागरूकता प्रयासों के फलस्वरूप अब तक 209 हेक्टेयर भूमि पर वैकल्पिक फसलों की बुवाई सफलतापूर्वक की जा चुकी है। किसान अब धान के स्थान पर मुख्य रूप से उड़द, मूंग, मूंगफली, रागी और मक्का जैसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं डुबाने वाले क्षेत्रों में धान की बुवाई की जा रही है।
फसल विविधीकरण से प्रगतिशील किसान बने प्रेरणा स्रोत
उदयपुर विकासखंड के ग्राम तोलंगा के किसान बनवारी ने इस वर्ष जल की अधिक खपत वाली धान की खेती के स्थान पर उड़द की फसल को अपनाया है। उनका कहना है कि दलहन फसलों में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है तथा लागत भी अपेक्षाकृत कम आती है। साथ ही बाजार में दलहन फसलों की अच्छी मांग होने से बेहतर मुनाफा प्राप्त हो रहा है। उन्होंने बताया कि फसल परिवर्तन से मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिल रहा है।
इसी तरह ग्राम परसा के किसान घासी राम ने अपने खेत में मक्का उत्पादन को प्राथमिकता दी है। उनका मानना है कि फसल विविधीकरण के माध्यम से बाजार की मांग के अनुरूप फसल उत्पादन कर बेहतर मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मक्का की खेती कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली फसल है, जिससे लागत कम और लाभ अधिक होने की संभावना रहती है।
फसल विविधीकरण से मजबूत होगी खेती और किसानों की आय
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार एक ही फसल लेने से मिट्टी की उर्वरक क्षमता प्रभावित होती है। वहीं फसल चक्र में बदलाव करने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है और भूमि की गुणवत्ता बेहतर होती है। इससे खेती लंबे समय तक टिकाऊ बनी रहती है।
जल संरक्षण की दृष्टि से भी फसल विविधीकरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है। धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों की तुलना में मक्का, रागी एवं दलहन फसलों को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। इससे भू-जल स्तर सुरक्षित रखने में मदद मिलती है और किसानों की सिंचाई लागत भी कम होती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि एक ही फसल को बार-बार उगाने से खेतों में कीट एवं बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जबकि अलग-अलग फसलें लेने से कीटों और रोगों का प्राकृतिक नियंत्रण संभव होता है, जिससे रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम होती है।
फसल विविधीकरण किसानों को आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करता है। बाजार में किसी एक फसल के दाम कम होने की स्थिति में अन्य फसलें किसानों की आय का सहारा बनती हैं। इससे खेती में जोखिम कम होता है और किसानों की आमदनी स्थिर बनी रहती है।
कृषि विभाग द्वारा किसानों को फसल विविधीकरण के प्रति लगातार जागरूक किया जा रहा है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार बदलते मौसम और जल संकट की स्थिति में वैकल्पिक फसलों को अपनाना समय की आवश्यकता है। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि खेती को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकेगा।
