जैविक मशरूम के उत्पादन से महिलाएं बन रही है आत्मनिर्भर
छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला अब सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं, बल्कि जैविक खेती और महिला सशक्तिकरण के लिए भी जाना जा रहा है. यहां की महिलाएं पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर नकदी फसल के रूप में जैविक मशरूम उत्पादन अपना रही हैं, जिससे वे आत्मनिर्भरता की दिशा में नए कदम बढ़ा रही हैं. यह पहल महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता, बेहतर स्वास्थ्य और पोषण प्रदान कर रही है, साथ ही उन्हें उद्यमी और समुदाय में नेतृत्वकर्ता बना रही है. शकुंतला वैको बताती हैं कि इस उद्यम ने उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता, परिवार की बेहतर आय और समाज में सम्मानजनक पहचान दी है. आज वे न केवल अपने परिवार की स्थिति सुधार रही हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर उद्यमिता अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं. दंतेवाड़ा का जैविक मशरूम रसायन-मुक्त होने के साथ-साथ प्रोटीन और विटामिन से भरपूर है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक माना जाता है. स्थानीय बाजारों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे महिलाओं को स्थायी आय प्राप्त हो रही है.
दंतेवाड़ा जिले में लागू प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना ने आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाई है. इसी योजना के तहत ग्राम बड़े कारली की कृषक शकुंतला वैको एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद शकुंतला ने प्रशिक्षण प्राप्त कर मशरूम उत्पादन को अपनी मुख्य आजीविका के रूप में अपनाया और इसे पूरी तरह जैविक पद्धति से करने का निर्णय लिया शकुंतला की सफलता यह साबित करती है कि सही प्रशिक्षण, सरकारी योजनाओं का सहयोग और स्वयं की मेहनत से दूरस्थ वनांचल की महिलाएं भी सफल उद्यमी बन सकती हैं. जैविक खेती ने महिलाओं के स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिति में सुधार किया है. यह मॉडल दंतेवाड़ा में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत उदाहरण बन रहा है जैविक खेती से न केवल महिलाओं को लाभ हो रहा है, बल्कि कृषि करने वाले परिवार स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम कर रहे हैं और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता से मुक्त हो रहे हैं
