जनजातीय आस्था और लोकधर्म का संगम- मावली मेला, आस्था का है 'महाकुंभ' आदिवासी संस्कृति की अनूठी झलक
बस्तर की संस्कृति बेहद अनुपम और सबसे जुदा है.बस्तर संभाग के सात जिले, नारायणपुर, बस्तर, जगदलपुर, कांकेर, कोंडागांव, दंतेवाड़ा और बीजापुर में आदिवासी संस्कृति से जुड़ी अलग अलग महोत्सव का आयोजन होता है. जिसमें बस्तर दशहरा, मड़ई मेला, बस्तर पंडुम और माता मावली मेला जैसे आयोजन शामिल हैं. हर वर्ष छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित नारायणपुर जिले में एक ऐसा अनोखा उत्सव लगता है, जो सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जनजातीय आस्था, लोकधर्म, संस्कृति, आस्था और समाज की आत्मा का प्रतीक है. यह नारायणपुर जिले को वैश्विक स्तर पर अलग पहचान दिलाता है. मावली मेला, जिसे स्थानीय भाषाओं में मावली मड़ई भी कहा जाता है, जनजातीय परंपरा का प्रतीक है और ग्रामीणों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है. यह मेला भक्ति, सामाजिक एकता, खेल-कूद, लोकनृत्य और सांस्कृतिक विविधता, व्यापार, अबूझमाड़ की सामाजिक समरसता का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है, जिसमें देवी-देवताओं के प्रतीक चिन्हों के साथ लोग अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं.
नारायणपुर मावली मेला आज केवल राज्य का ही नहीं, बल्कि भारत के लोक सांस्कृतिक इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित मेलों में से एक माना जाता है, जहां देश-विदेश से लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ शामिल होते हैं. प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी विश्व प्रसिद्ध माता मावली मेला महाशिवरात्रि के पहले बुधवार को आयोजित हुआ. यह मेला आज 11 फरवरी से लेकर 15 फरवरी तक चलेगा. जिसकी शुरुआत बुधवार से हो चुकी है.
मावली मेला: सदियों पुरानी परंपरा और बस्तर की जीवंत धरोहर
माता मावली मेला अपने आप में जैविक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवित दस्तावेज़ है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मेला सदियों पहले से चला आ रहा है और यह उसी परंपरा का प्रतीक है, जो इस क्षेत्र के आदिवासी और जनजातीय समाज ने पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखी है. कुछ स्थानीय स्रोतों के अनुसार यह मेला लगभग 800 वर्ष से भी अधिक पुराना है और आज यह धार्मिक विश्वास, सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय जीवन की अहम पहचान बन चुका है. यहां के आदिवासी समुदाय खासकर गोण्ड, मुरिया, हल्बा, गाड़ा और अन्य स्थानीय जनजातियां मावली माता को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं और इसी आस्था के साथ यह मेला आयोजित होता है, जिसमें स्थानीय साधु-पुजारी और गुनिया समुदाय विशेष भूमिका निभाते हैं.
मावली परघाव रस्म से होती है शुरुआत
मावली मेला की शुरुआत होती है “मावली परघाव” रस्म से होती है. यह ऐसा धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें देवी-देवताओं द्वारा माता मावली मंदिर पहुंचकर माता मावली को विशेष तरीके से पूजन किया जाता है और उनसे आशीर्वाद लिया जाता है. जैसा कि परंपरा है, आसपास के गावों,पड़ोसी जिले और अन्य राज्यों से लोग अपने-अपने देवी-देवताओं के प्रतीक चिन्हों जैसे छत्र,डांगई (काठी), डोली(पलकी), आंगा आदि के साथ नारायणपुर मावली मंदिर तक आते हैं. यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का अद्भुत उत्सव है, जहां ढोल-नगाड़ों की थाप और गीत-सभाओं के बीच श्रद्धालु एक साथ चलते हैं.
मावली मेले का सबसे बड़ा आकर्षण देवखेलनी
मावली मेले का सबसे बड़ा आकर्षण है देवखेलनी कार्यक्रम है. इस देवखेलनी में देवी-देवताओं के प्रतीक स्थलों को स्थानीय पुजारियों,सिरहा और गुनिया समुदाय के लोगों द्वारा पूजा जाता है. देवी शक्ति की सत्यता सिद्ध करने और देवताओं के पराक्रम को प्रदर्शित करने हेतु देव खेलने का आयोजन होता है. जिसमें देवी देवताओं का आवाहन सिरहा एवं पुजारी अपने शरीर में करते हैं और इसकी प्रमाणिकता हेतु वे अपने खुले बदन पर कटीले लोहे के जंजीर से वार करते हैं. इस अद्भुत एवं रोमांचित कर देने वाले अनुष्ठान को देखने बड़ी संख्या में लोग एकत्र होते हैं.
क्या है देवखेलनी जानिए ?
इस वर्ष भी देव खेलनी का आयोजन बुधवार बाजार प्रांगण में हुआ जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु एवं सैकड़ो की संख्या में देवी देवी देवताओं के प्रतीक की मौजूदगी रही है. यहां के स्थानीय ग्रामीणों जो दैवीय संस्कृति में आस्था रखते है उनके लिए यह अबूझमाड़ की कठिन परिस्थितियों को इंगित करता एक दैविक अनुष्ठान है. जो इन्हें इस कठिन परिस्थितियों में जीवन के मोल को समझाता है. देवखेलनी में भक्तिमय माहौल और लोकजीवन की आत्मीयता का आनंद लेने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु जमा होते हैं. यह दृश्य भावनात्मक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत प्रेरणादायक होता है.देवखेलनी के दौरान स्थानीय कलाकार, पारंपरिक ढोल-नगाड़ों, गीत-नृत्य के साथ यह कार्यक्रम चलता है, जो इस मेलों को सिर्फ धार्मिक अवसर ही नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का महत्त्वपूर्ण उत्सव भी बनाता है.
आदिवासी ढोल नृत्य: सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार मेंले के एक दिन पूर्व आदिवासी समाज अपने समाज भवन में एकत्र होते हैं और पारंपरिक ढोल नृत्य का आयोजन करते हैं यह आयोजन पूरे रात देवी देवताओं के सम्मान में आयोजित होता है.
मावली परघाव रस्म: यह मावली मेला का प्रारंभिक कार्यक्रम है जो बुधवार को होता है जिसमें देवी-देवताओं को मंदिर से बाहर आम जनता के बीच लाया जाता है और उनका स्वागत किया जाता है. इसके बाद सभी देवी देवता मावली माता से मेला स्थल परिक्रमा और की हेतु चलने का आवाह्न करते हैं. माता मावली के प्रतीक के तौर पर माता के छत्र और ज्योत को लेकर बुधवारी बाजार स्थल पहुंचा जाता है.
देव खेलनी का आयोजन:माता के छत्र लेकर सभी देवी देवताओं के प्रतीक और सिरहा बुधवारी बाजार स्थल पहुंचते हैं जहां भव्य देवखेलनी का आयोज होता है. जिस स्थान पर आम नागरिक और ग्रामीण सभी माता के छत्र और देवी देवताओं के प्रतीक का दर्शन करने के साथ साथ आशीर्वाद ग्रहण करते हैं. माना जाता है इस दौरान माता मावली मंदिर से निकल कर आशीर्वाद प्रदान करने के साथ साथ देवी देवताओं से समस्त क्षेत्र की जानकारी लेते हैं और सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं.
बच्चों के कंधे पर देव परंपरा की जिम्मेदारी :देव खेलनी स्थल पर एक तस्वीर निकलकर सामने आई जहां जनजातीय समाज के बच्चों ने अपने कंधों पर आंगा देव के प्रतीक को उठाया हुआ था यह बतलाता है कि यहां को आदिवासी समाज अपनी संस्कृति किस प्रकार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपते हैं और सदी दर सदी से बिना किसी लिखित दस्तावेजों के भी अपनी परम्परा को रूढ़ि स्वरूप में बचाए हुए हैं.
ढाई कोसी की परिक्रमा: देव खेलनी उपरांत देवी-देवताओं के प्रतीक को लेकर पूरे मेले का शुभारंभ ढाई कोसी की परिक्रमा के साथ किया जाता है, जो मावली माता के साथ पूरी आस्था और विश्वास का प्रतीक है। और यह भी बतलाता है कि जनजातीय समाज में देवी देवताओं का कितना महत्वपूर्ण स्थान है.
पूजा स्थलों का समागम: मेला स्थल पर पहुंचने से पहले जगदीश मंदिर, महादेव घाट, कोटगुड़िन माता के समक्ष विशेष पूजा अर्चना की जाती है और भवर देव मंदिर प्रांगण और गढ़ गुड़रा मंदिर में भी विशेष पूजन कार्यक्रम आयोजित होते हैं.
लोक जीवन का उत्सव: मावली मेला सिर्फ धार्मिक पूजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह एक सामाजिक उत्सव भी होता है. मेला आरंभ की अनुमति मिलने के बाद देर रात को मेले में ग्रामीण लोग रात-भर नृत्य-गान, पारंपरिक संगीत, लोकदेवताओं के गीत, भक्ति-गायन और ढोल-नगाड़ों के साथ उल्लास मनाते हैं. यह त्यौहार सभी समुदायों के लिए एक ऐसी जगह बन जाता है. जहां उम्र, जाति-धर्म, समाजिक भेद समाप्त हो जाते हैं और एक अनुभूतिगत एकता का अनुभव होता है.
अबूझमाड़ का प्रभाव और ग्रामीण संस्कृति की झलक
नारायणपुर मवली मेला की एक विशेष बात यह भी रही है कि वर्षों तक अबूझमाड़ के नक्सल प्रभावित हिस्सों के कारण ग्रामीण वहां के मेलों की गतिविधियों में शामिल होने से दूर रहे. पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के कारण अबूझमाड़ से भी बड़ी संख्या में ग्रामीणों के आने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे मेला की रौनक पहले से भी अधिक रहेगी. यह बदलाव दर्शाता है कि किस प्रकार प्रशासनिक सुरक्षा और विकास की योजनाओं ने इस सांस्कृतिक उत्सव को फिर से जीवित किया है.
विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है बस्तर का मावली मेला
माता मावली मेला न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति और लोकपरंपरा के कारण प्रसिद्ध है. इतना ही नहीं, भारत के प्रधानमंत्री द्वारा भी मन की बात कार्यक्रम में इस मेले की प्रशंसा की जा चुकी है, जिससे इसकी सांस्कृतिक महत्ता और पहचान और अधिक विस्तृत होती है.माता मावली मेला भारतीय विविध संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है. जहां लोकजीवन के रंग,आस्था की गहराई,पारंपरिक रस्मों की जटिलता और सामाजिक एकता का अद्भुत मिलन होता है. यह मेला सदियों से चली आ रही परंपरा का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि कैसे एक समुदाय अपनी संस्कृति और विश्वास को समय के साथ भी जीवित रख सकता है.
संस्कृति, विकास और सामाजिक प्रतिबद्धता की पहचान है मावली मेला
माता मावली मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है यह सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता, स्थानीय जीवन शैली और पर्यटन की दिशा का उत्सव है. मावली मेले में बस्तर की संस्कृति, बस्तर की परंपरा, बस्तर के रीति रिवाज और पुरातन काल से चली आ रही विधि का समावेश है. यहां आने वाला हर शख्स बस्तर की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को देख दंग हो उठता है.
