बंदूक से रोजगार तक, मैत्री कैफे में बदल रही पुनर्वास की तस्वीर
नारायणपुर जिला लंबे समय तक नक्सलवाद की चुनौती से प्रभावित रहा है। विशेष रूप से अबूझमाड़ क्षेत्र में अनेक लोगों का जीवन हिंसा, भय और संगठनात्मक गतिविधियों के बीच प्रभावित हुआ। ऐसे वातावरण में नक्सली संगठन से बाहर निकलकर सामान्य सामाजिक जीवन में लौटना केवल हथियार छोड़ने तक सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके साथ सम्मानजनक आजीविका, सामाजिक स्वीकार्यता, पारिवारिक जीवन और आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। इसी दृष्टिकोण के अनुरूप छत्तीसगढ़ शासन द्वारा नक्सलवादी आत्मसमर्पण, पीड़ित राहत एवं पुनर्वास नीति-2025 लागू की गई है। नीति का उद्देश्य आत्मसमर्पित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में पुनर्स्थापित करना तथा उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार, आर्थिक सहायता एवं अन्य पुनर्वास सुविधाओं से जोड़ना है। नारायणपुर में इस नीति को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित न रखते हुए व्यावहारिक आजीविका से जोड़ने की दिशा में मैत्री कैफे एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
मैत्री कैफे - पुनर्वास का नया मॉडल
जिला प्रशासन, नारायणपुर द्वारा 21 जून 2026 से प्रारंभ किए गए मैत्री कैफे में पांच आत्मसमर्पित, पुनर्वासित व्यक्तियों को रोजगार उपलब्ध कराया गया। इन पांचों व्यक्तियों को कैफे के संचालन से संबंधित विभिन्न कार्यों में लगाया गया है। इनमें किचन एवं खाद्य सामग्री की तैयारी, ग्राहकों से ऑर्डर प्राप्त करना, खाद्य एवं पेय पदार्थ परोसना, कैफे की साफ-सफाई एवं व्यवस्था तथा दैनिक संचालन में सहयोग जैसे कार्य शामिल हैं। प्रत्येक व्यक्ति को लगभग 6,500 रूपये प्रतिमाह पारिश्रमिक प्राप्त हो रहा है। यह पहल इसलिए विशेष है क्योंकि पुनर्वासित व्यक्तियों को केवल आर्थिक सहायता प्रदान करने के बजाय उन्हें नियमित कार्य, जिम्मेदारी, आय और सामाजिक संपर्क से जोड़ा गया है।
एक ही स्थान पर बदल गई पांच जिंदगियां
मैत्री कैफे में कार्यरत पांचों पुनर्वासित व्यक्तियों की पृष्ठभूमि अलग-अलग रही है। किसी ने संगठन में चिकित्सा संबंधी भूमिका निभाई, किसी ने कृषि से जुड़े कार्य देखे और किसी ने प्रचार-प्रसार एवं प्रेस संबंधी गतिविधियों में भूमिका निभाई। आज वही लोग एक साथ मिलकर एक कैफे का संचालन कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल रोजगार प्राप्त करने का परिवर्तन नहीं है, बल्कि जीवन की दिशा बदलने का उदाहरण है।
सुखलाल जुरीं और कमला गोटा जंगल से सामान्य गृहस्थ जीवन तक
इस सफलता की कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष है आत्मसमर्पित दंपति सुखलाल जुर्री एवं कमला गोटा का एक साथ सामान्य जीवन की ओर लौटना। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार सुखलाल जुर्री प्रतिबंधित माओवादी संगठन में क्टब्ड स्तर पर सक्रिय रहे तथा संगठन में चिकित्सा संबंधी भूमिका भी निभाते थे। कमला गोटा भी संगठन में सक्रिय पद पर रही थीं। एक समय जंगल में संगठनात्मक जीवन जीने वाले इस दंपति के हाथों में हथियार थे; आज वही हाथ मैत्री कैफे की रसोई में भोजन एवं पेय पदार्थ तैयार कर रहे हैं और ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं। आत्मसमर्पण के बाद उनका जीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। अब वे शहर में किराये का कमरा लेकर रह रहे हैं। घर का किराया, भोजन, दैनिक आवश्यकताएं और पारिवारिक जिम्मेदारियां अब उनके अपने श्रम और आय से पूरी हो रही हैं। पहले जहां जीवन संगठन पर निर्भर था, वहीं अब वे स्वयं कार्य कर आय अर्जित कर रहे हैं।
निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर, संगठनात्मक जीवन से नियमित रोजगार तक
आरती सलाम भी लंबे समय तक माओवादी संगठन से जुड़ी रही थीं। आज वे मैत्री कैफे में अन्य पुनर्वासित साथियों के साथ कार्य कर रही हैं। जहां पूर्व जीवन में गतिविधियां संगठन के निर्देशों से निर्धारित होती थीं, वहीं अब उनके दिन की शुरुआत निश्चित कार्य समय, जिम्मेदारी और रोजगार के साथ होती है। उनके लिए यह परिवर्तन सामाजिक पुनर्स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
पुनर्वास का आर्थिक प्रभाव
मैत्री कैफे से जुड़े पांच व्यक्तियों को लगभग 6,500 रूपये प्रतिमाह पारिश्रमिक मिलने से प्रत्येक व्यक्ति को नियमित आय का स्रोत प्राप्त हुआ है। पांचों व्यक्तियों को मिलाकर लगभग 32,500 रूपये प्रतिमाह का पारिश्रमिक सृजित हो रहा है। एक वर्ष में यह राशि लगभग 3.90 लाख रूपये होती है। इस आय से पुनर्वासित व्यक्ति अपने दैनिक जीवन, आवास, भोजन एवं पारिवारिक आवश्यकताओं में स्वयं योगदान कर पा रहे हैं। इस प्रकार पहल का प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थायी आर्थिक आत्मनिर्भरता की आधारभूमि तैयार कर रही है।
सामाजिक पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
पुनर्वास की सफलता को केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं मापा जा सकता। इस पहल से पांचों व्यक्तियों को नियमित कार्य वातावरण, समाज के सामान्य लोगों से प्रतिदिन संपर्क, सम्मानजनक कार्य, नियमित आय, जिम्मेदारी का बोध, टीम में कार्य करने का अवसर और सामान्य जीवन शैली अपनाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। इससे उनमें सामाजिक आत्मविश्वास बढ़ने और मुख्यधारा में स्थायी रूप से जुड़ने की संभावना मजबूत होती है।
सफलता का मूल संदेश
मैत्री कैफे की कहानी यह सिद्ध करती है कि किसी व्यक्ति के अतीत को बदलना संभव न हो, लेकिन उसके वर्तमान को अवसर देकर और भविष्य को दिशा देकर बदला जा सकता है। सुखलाल और कमला जैसे दंपति, जिन्होंने कभी जंगल में असामान्य और संघर्षपूर्ण जीवन बिताया, आज एक ही स्थान पर साथ काम करते हुए सामान्य गृहस्थ जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। फूलमती, जो कभी संगठन के प्रचार-प्रसार से जुड़ी थीं, आज आम नागरिकों की सेवा कर रही हैं। आरती और अन्य पुनर्वासित साथी आज नियमित रोजगार के माध्यम से अपनी नई पहचान बना रहे हैं। इन सभी की कहानी का सार एक ही है - हथियार छोड़ना आत्मसमर्पण है, लेकिन रोजगार से जुड़ना वास्तविक पुनर्वास है।
