रासायनिक खाद का बेहतर विकल्प बनी हरी खाद - धान की खेती में सबसे ज्यादा उपयोग
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में मानसून के साथ ही किसान खेती किसानी में लग जाते हैं, जिस इलाके में बारिश अच्छी हुई है, वहां किसान धान की खेती कर चुके है. लेकिन जहां बारिश नहीं हुई है. वहां आज भी किसान खेती शुरू नहीं कर सके है. ऐसे में रासायनिक खाद की बढ़ती कीमत और समय समय पर होने वाली किल्लत के बीच किसानों के लिए हरी खाद एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आया है.
इस खाद का फसल में उपयोग करने से न सिर्फ फसल अच्छी होती है बल्कि मिट्टी कि उर्वरा शक्ति भी लंबे समय तक बनी रहती है. इससे धान की फसल में उत्पादन बढ़ने के साथ खरपतवार और कीट का प्रभाव कम होता है. ऐसे में गरीब तपके के किसानों के लिए ये खाद बेहतर विकल्प के तौर पर साबित हो रहा है. गांव में खूब लोकप्रिय है. अगर किसानों ने अभी रोपाई नहीं की है. रासायनिक खाद से हट कर दूसरा विकल्प ढूंढ रहे हैं तो उनके लिए हरी खाद बेहतर विकल्प साबित होगा.
कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि रासायनिक खाद की कमी और किसानों की बढ़ती निर्भरता को देखते हुए हरी खाद का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. इसके लिए मुख्य रूप से ढेंचा, सन, सनई, मूंग, उड़द, चरोटा और ग्वार जैसी फसलें उगाई जाती हैं. कई किसान ढेंचा और सन का बीज एक साथ भी बोते हैं, जिससे अधिक जैविक पदार्थ तैयार होता है.
हरी खाद का उपयोग मुख्य रूप से धान की खेती में किया जाता है. खेत में पहले ढेंचा और सन जैसी फसलें बोई जाती हैं. जब इनमें फूल आने लगते हैं, तब इनकी कटाई कर इन्हें मिट्टी में मिला दिया जाता है, इसके बाद उसी खेत में धान की रोपाई की जाती है.
विशेषज्ञ के अनुसार हरी खाद की बुवाई मई के अंतिम सप्ताह से जून के पहले सप्ताह के बीच छिटकवा विधि से करनी चाहिए. बुवाई के 45 से 55 दिन बाद जब फसल फूल आने की अवस्था में पहुंच जाए, तब उसे काटकर मिट्टी में मिला देना चाहिए. इसके बाद करीब एक सप्ताह तक खेत को छोड़ दें ताकि फसल अच्छी तरह सड़कर जैविक खाद में बदल जाए. इसके बाद धान की रोपाई करना सबसे लाभकारी माना जाता है.
विशेषज्ञ ने बताया कि ढेंचा और अन्य दलहनी फसलों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु पाए जाते हैं. ये जीवाणु वायुमंडल में मौजूद नाइट्रोजन को अवशोषित कर मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं. इसके अलावा फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है, जिससे मिट्टी की रासायनिक और भौतिक संरचना मजबूत होती है.
हरी खाद तेजी से बढ़ती है, जिससे खेत में खरपतवार को पनपने का मौका नहीं मिलता. इसके उपयोग से खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है, साथ ही कीट एवं रोगों का प्रकोप भी कम होता है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है.
कृषि विशेषज्ञ ने बताया कि कई किसानों के अनुभव में हरी खाद अपनाने के बाद पहले जहां दो बोरी रासायनिक खाद की जरूरत पड़ती थी. अब केवल एक बोरी में ही काम चल जाता है. इससे खेती की लागत घटती है और उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि धान की खेती करने वाले किसान अगर समय पर हरी खाद की बुवाई कर वैज्ञानिक तरीके से उसका उपयोग करें. रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होगी. मिट्टी की सेहत सुधरेगी और कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल सकेगा.
