छिंद के पत्तों से महिलाओं की संवार रहीं हैं जिंदगी - गुलदस्ते और राखी बनाकर महिलाएं बन रही आत्मनिर्भर
झोड़ियांबाडम गांव की महिलाएं छिंद के पत्तों से गुलदस्ता तैयार कर रहीं हैं. रक्षाबंधन करीब है, लिहाजा छिंद के पत्तों से राखियां भी बना रहीं हैं. सभी महिलाएं तारा स्व सहायता समूह से जुड़ीं हैं और रामबती पोडियाम के मार्गदर्शन में काम करती हैं. रामबती पोडियाम सफल ग्रामीण उद्यमी के रूप में पहचान बना चुकी हैं और अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रहीं हैं. वह साल 2020 से शासन की बिहान योजना से जुड़ी हैं. बिहान से जुड़ने से पहले रामबती दीदी की आजीविका मुख्य रूप से पारंपरिक कृषि और मजदूरी पर निर्भर थी. परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी. पति की तबीयत भी अक्सर खराब रहती थी. मुश्किल परिस्थितियों ने उनके हौसले को कमजोर नहीं किया. स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया. प्रशिक्षण ने उन्हें नई चीजें सीखने का अवसर दिया और धीरे-धीरे उनके भीतर आत्मविश्वास और उद्यमिता की भावना मजबूत होती गई. इसी दौरान उन्होंने छिंद के पत्तों से आकर्षक गुलदस्ते तैयार करने का हुनर सीखा. शुरुआत छोटे स्तर से हुई, लेकिन मेहनत और गुणवत्ता के दम पर यह काम धीरे-धीरे नियमित व्यवसाय में बदल गया.
रामबती दीदी द्वारा तैयार किए जाने वाले छिंद के गुलदस्ते प्राकृतिक संसाधनों से बनाए जाते हैं. आकर्षक डिजाइन और स्थानीयता से जुड़े होने के कारण इनकी बाजार में अच्छी मांग है. एक गुलदस्ते की कीमत लगभग 80 से 120 रुपये तक होती है और वर्षभर में 3,000 से अधिक गुलदस्तों की बिक्री होती है. पिछले एक वर्ष में ही रामबती दीदी ने 6 लाख रुपये से अधिक के छिंद के गुलदस्तों का कारोबार किया है. खास बात यह है कि तीन दिवसीय बस्तर पंडुम आयोजन के दौरान ही लगभग 3 लाख रुपये के गुलदस्तों की बिक्री हुई.
छिंद पत्ते से गुलदस्ते, राखी बनाते हैं. तीस-पैंतीस लाख रुपए कमा चुके हैं. सुकमा, जगदलपुर, बीजापुर समेत दूसरे जिलों में भेजते हैं. शासन से भी मदद मिल रही है. कार्यक्रमों में भी ले जाते हैं. जनप्रतिनिधियों के स्वागत के लिए भी छिंद के गुलदस्ते खरीदते हैं. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सीएम समेत तमाम बड़े नेताओं का स्वागत हमारे बनाए छिंद के गुलदस्तों से ही किया गया है. सचिन तेंदुलकर भी आए थे तो उनका स्वागत भी छिंद के गुलदस्ते से किया गया था-रामबती पोडियाम
रामबती दीदी ने अपने व्यवसाय को किसी एक उत्पाद तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने त्योहारों और बाजार की मांग के अनुसार अलग-अलग उत्पाद तैयार कर अपनी आजीविका को सालभर चलने वाला कारोबार बना दिया है. होली पर वह प्राकृतिक और हर्बल रंगों से हर्बल गुलाल तैयार कर बेचती हैं. रक्षाबंधन पर छिंद के पत्तों से राखियां तैयार करती हैं. साल भर छिंद के गुलदस्ते बनाती हैं. वहीं महुआ, तेंदूपत्ता और साल बीज के कारोबार से भी जुड़ी रहती हैं.
बिहान के तहत रामबती पोडियाम ने सफलता हासिल की है. वह छिंद के पत्ते से गुलदस्ते बना रहीं हैं. इसमें दंतेवाड़ा की संस्कृति झलकती है. रामबती पोडियाम ने खुद की कमाई से जमीन भी खरीदी है. समूह ने एक साल में पैंतीस से चालीस लाख की कमाई की है. बस्तर पंडुम में भी इन्होंने 3000 से ज्यादा गुलदस्ते भेजे हैं. ऐसा नहीं है कि ये लोग एक ही प्रोडक्ट में फोकस करते हैं. 12 महीने इनका कारोबार होता है. गुलदस्ते बनाते हैं. होली में गुलाल बनाते हैं. शहद भी बनाते हैं. प्रशासन की तरफ से इनको मार्केटिंग का सपोर्ट भी मिला है. यह सभी के लिए रोल मॉडल है. ये साल भर कमाई करते हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं-एम भार्गव,जिला पंचायत सीईओ
रामबती दीदी की सफलता का असर अब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में भी साफ दिखाई देता है. विभिन्न आजीविका एवं व्यवसायिक गतिविधियों से अब तक उनकी लगभग 35 से 40 लाख रुपये तक की कुल आमदनी हो चुकी है. अपनी मेहनत से अर्जित आय से उन्होंने गांव में जमीन भी खरीदी है.
रामबती दीदी की सफलता अब केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं है. उनकी कार्यशैली और उपलब्धियों से प्रभावित होकर गांव की अन्य महिलाएं भी छिंद उत्पादों और वनोपज आधारित गतिविधियों से जुड़ने लगी हैं.वह महिलाओं को प्रशिक्षण देने, उन्हें काम से जोड़ने और बाजार तक पहुंच बनाने में भी सहयोग करती हैं. उनका प्रयास है कि गांव की अधिक से अधिक महिलाएं अपने पारंपरिक कौशल को आय के साधन में बदलें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें.
रामबती दीदी अब अपने कारोबार को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी में हैं. उनकी योजना छिंद के गुलदस्ते, प्राकृतिक राखियां, हर्बल गुलाल और अन्य स्थानीय उत्पादों को एक सामूहिक ब्रांड के माध्यम से बड़े बाजार तक पहुंचाने की है.
