जंगल की पत्तियां बनी कमाई का जरिया, कम समय में मिल रही हजारों की आमदनी - CGKIRAN

जंगल की पत्तियां बनी कमाई का जरिया, कम समय में मिल रही हजारों की आमदनी


 छत्तीसगढ़ के जंगलों से जुड़े पारंपरिक काम आज भी ग्रामीण और आदिवासी परिवारों की आजीविका का अहम हिस्सा बने हुए हैं. खासकर गर्मी के मौसम में तेंदूपत्ता संग्रहण हजारों परिवारों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बन जाता है. छत्तीसगढ़ के बड़भूम निवासी टिलूराम मंडावी भी उन लोगों में शामिल हैं, जो पिछले 40 वर्षों से तेंदूपत्ता संग्रहण का काम करते आ रहे हैं. इस बार भी वे अपनी पत्नी और बेटी के साथ जंगल पहुंचकर तेंदूपत्ता संग्रहण में जुटे हुए हैं. टिलूराम मंडावी बताते हैं कि तेंदूपत्ता संग्रहण पूरी तरह सीजन आधारित काम है, जो साल में कुछ दिनों के लिए ही होता है. लेकिन इन कुछ दिनों की मेहनत से परिवार को अच्छी अतिरिक्त आमदनी मिल जाती है. उन्होंने बताया कि कुछ महीने पहले महुआ संग्रहण कर भी परिवार ने खेती-किसानी के अलावा अतिरिक्त आय अर्जित की थी. अब तेंदूपत्ता का सीजन शुरू होते ही पूरा परिवार फिर जंगल की ओर निकल पड़ा है.

तेंदूपत्तों को सावधानी से तोड़ा जाता

सुबह जल्दी जंगल पहुंचकर तेंदूपत्तों को सावधानी से तोड़ा जाता है, ताकि पत्ते खराब न हों. इसके बाद घर लाकर उन्हें गिना और बांधा जाता है. टिलूराम बताते हैं कि 50 पत्तों का एक बंडल तैयार होता है और 100 बंडल पर 500 रुपये की राशि मिलती है. करीब एक हफ्ते तक लगातार काम करने के बाद वे लगभग 2500 रुपये तक की शुद्ध कमाई कर लेते हैं. संग्रहण के बाद तेंदूपत्तों को गांव के ही तेंदूपत्ता संग्रहण केंद्र में बेच दिया जाता है.

ग्रामीण जीवन से जुड़ी परंपरा

टिलूराम मंडावी के अनुसार तेंदूपत्ता संग्रहण केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि जंगल और ग्रामीण जीवन से जुड़ी परंपरा का भी हिस्सा है. गर्मी के दिनों में जब खेती का काम कम हो जाता है, तब यही वन उपज ग्रामीण परिवारों के खर्च चलाने में मदद करती है. खासकर आदिवासी इलाकों में तेंदूपत्ता, महुआ और अन्य लघु वनोपज लोगों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं.

टिलूराम मंडावी का कहना है कि राज्य सरकार की तेंदूपत्ता संग्रहण योजना से जंगल क्षेत्र में रहने वाले परिवारों को रोजगार और अतिरिक्त आय का अच्छा अवसर मिलता है. इससे ग्रामीणों को गांव में ही काम मिल जाता है और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है. वर्षों से इस काम से जुड़े परिवार आज भी जंगल से अपने जीवन का महत्वपूर्ण सहारा प्राप्त कर रहे हैं.

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