अबूझमाड़ के उस आखिरी छोर तक प्रशासन की दस्तक,आजादी के बाद पहली बार पहुंचीं कलेक्टर
कभी नक्सलियों की राजधानी कहलाने वाले कुतुल ग्राम पंचायत के आश्रित ग्राम आलबेड़ा में किसी उत्सव सा माहौल है. पारंपरिक वेशभूषा में कुछ ग्रामीण सजे धजे हैं. गाजे-बाजे की व्यवस्था भी की गई है. खास बात यह है कि स्वागत के लिए महुआ की माला भी लाई गई है.ग्रामीण मैनू राम वर्धा बताते हैं कि हमारे गांव में करीब 196 लोग रहते हैं. आज आजादी के बाद पहली बार हमारे गांव में कोई अधिकारी आ रहा है, इसलिए किसी त्योहार जैसा माहौल है. स्वागत के लिए खास इंतजाम भी किया गया और फिर शुरू हुआ उस आलबेड़ा के ग्रामीणों का इंतजार, जिन्होंने दशकों तक नक्सलवाद का दंश झेला है.
आलबेड़ा भी उन गांव में से एक है, जहां प्रशासन पहली बार पहुंचा है. कस्तूरमेटा से लगभग 30 किलोमीटर का सफर तय कर हम यहां पहुंचे हैं. गांव वाले उत्साहित नजर आए. ढोल बजाकर, महुआ की माला पहनाकर पारंपरिक तरीके से ग्रामीणों ने स्वागत किया. हमने यहां शिविर लगाया. ग्रामीणों से उनकी मूलभूत सुविधाओं और अन्य जरुरतों को लेकर संवाद किया गया.अभी ये पहाड़ियों का रास्ता है. पहले कोशिश की जाएगी कि लेबलिंग वर्क जल्दी की जाए. ग्रामीणों की मूलभूत सुविधाओं की सभी मांगों पर जल्द कार्रवाई की जाएगी: नम्रता जैन, कलेक्टर
कलेक्टर नम्रता जैन का काफिला जब आलबेड़ा पहुंचा, तो ग्रामीणों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा. ग्रामीणों ने पारंपरिक मांदरी नृत्य के साथ उनका स्वागत किया.गांव की महिलाएं और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर आए. उन्होंने महुआ और सिहाड़ी से बनी माला पहनाकर कलेक्टर का आत्मीय स्वागत किया.आलबेड़ा गांव पहुंचकर कलेक्टर ने किसी औपचारिक बैठक के बजाए महुआ और आम के पेड़ के नीचे चौपाल लगाई. यह चौपाल केवल एक बैठक नहीं थी, बल्कि यह संवाद का एक जीवंत माध्यम था.कलेक्टर ने ग्रामीणों से उनकी ही भाषा, गोंडी में बातचीत की. इससे ग्रामीणों को अपनी बात खुलकर रखने का अवसर मिला. ग्रामीणों ने अपनी समस्याओं को बेझिझक साझा किया, चाहे वह सड़क की समस्या हो, स्वास्थ्य सुविधा की कमी हो या फिर शिक्षा और बिजली की दिक्कतें. ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव तक कोई सड़क नहीं है. बारिश के दिनों में गांव पूरी तरह से कट जाता है. किसी भी प्रकार की आवाजाही संभव नहीं हो पाती. बीमार मरीजों को अस्पताल पहुंचाने और राशन लाने ले जाने में भारी दिक्कत होती है.गांव में लाइट की समस्या है. झरेन का पानी पीते हैं. गंदा पानी पीने से बच्चे बीमार भी पड़ जाते हैं: बीमार लोगों को अस्पताल ले जाने के लिए 20-25 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. कई बार मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. गंभीर मरीज को कावड़ के सहारे ले जाना मजबूरी बन गई है.हमें कोई भी मूलभूत सुविधा नहीं मिल रही. हमारे गांव की जनसंख्या करीब 196 है. यहां पहली बार कलेक्टर का दौरा हुआ है. पहले यहां नक्सली रहते थे, इसलिए कोई नहीं पहुंच पाता था. अब विकास की उम्मीद है, अस्पताल की भी सुविधा बढ़ेगी: ग्रामीण, आलबेड़ा
बिजली और पानी की कमी
गांव में बिजली नहीं होने के कारण रात के समय जीवन बेहद कठिन हो जाता है. पीने के पानी की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. ग्रामीण आज भी पारंपरिक झिरिया के पानी पर निर्भर हैं.
राशन वितरण की समस्या
ग्रामीणों को राशन लेने के लिए 20-22 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. उन्होंने मांग की है कि गांव में ही पीडीएस व्यवस्था शुरू की जाए.अभी फिलहाल लोग मोहंदी से जाकर राशन ले रहे हैं. कोशिश की जाएगी कि यहां जल्द राशन पहुंचाया जाए. यह तभी मुमकिन होगा, जब यहां सड़क बनेगी. बारिश से पहले हमारी कोशिश है कि यहां 3 महीने का राशन पहुंचा दिया जाए. सड़क बहुत खराब है. पहली बार प्रशासन पहुंचा तो जमीनी हालात का पता चला. शिविर के माध्यम से ऐसे सभी गांव तक पहुंचना चाहते हैं और जमीनी हकीकत समझना चाहते हैं: नम्रता जैन, कलेक्टर
पक्के आवास की मांग
ग्रामीणों ने कलेक्टर से प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत पक्के आवास बनाए जाने की मांग रखी है. वर्तमान में गांव के घर घास-फूस और सीमेंट की शीट से बने हैं.
आज कलेक्टर मैडम आई हैं. पहले नक्सलियों का प्रभाव था, इसलिए यहां आने से सभी डरते थे.यहां सड़क नहीं है. जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे पहले डोली बनाकर हम कंधे पर उठाकर पास के गांव ले जाते हैं. पहाड़ चढ़ना उतरना पड़ता है. राशन लाने के लिए भी बहुत दिक्कत होती है. पास के गांव में जाकर राशन लाते हैं: मुरहा राम, ग्रामीण, आलबेड़ा
बच्चों के सपनों में आया बदलाव
कलेक्टर ने गांव की बच्चियों से बातचीत की. जब उन्होंने पूछा कि वे बड़ी होकर क्या बनना चाहती हैं, तो एक बच्ची ने आत्मविश्वास से कहा, “मैं कलेक्टर बनना चाहती हूं.” यह जवाब केवल एक मासूम इच्छा नहीं थी, बल्कि यह उस बदलाव का प्रतीक था, जो अबूझमाड़ में धीरे-धीरे आ रहा है. जहां कभी बच्चों के लिए भविष्य की कोई स्पष्ट दिशा नहीं थी, आज वहीं के बच्चे बड़े सपने देखने लगे हैं. यह परिवर्तन शिक्षा और जागरूकता के विस्तार का संकेत है.
कलेक्टर ने बच्चों के साथ खाया खाना
कुछ स्कूल के बच्चे यहां आए. हमने साथ में भोजन किया. एक बच्ची ने कहा कि मुझे शिक्षक बनना है. एक बच्ची ने कहा कि मुझे कलेक्टर बनना है. यह अच्छी बात है कि ये लोग समझ रहे हैं, कौन से पद पर बैठे लोग क्या करते है और उसे कैसे अचीव करना है, ये बच्चे सोचने लगे हैं: नम्रता जैन, कलेक्टर
प्रशासन का भरोसा और संवेदनशीलता
कलेक्टर नम्रता जैन ने ग्रामीणों की हर समस्या को गंभीरता से सुना और समाधान का आश्वासन दिया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रशासन का उद्देश्य केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है. ग्रामीणों के साथ बैठकर भोजन करना कलेक्टर की संवेदनशीलता और जुड़ाव का प्रतीक था. इससे ग्रामीणों को यह महसूस हुआ कि प्रशासन उनके साथ खड़ा है.
बदलाव की ओर बढ़ता अबूझमाड़
आलबेड़ा जैसे गांव में कलेक्टर का पहुंचना यह दर्शाता है कि अबूझमाड़ में बदलाव की लहर तेज हो रही है. यह केवल एक दौरा नहीं, बल्कि एक संदेश है कि अब कोई भी क्षेत्र विकास से अछूता नहीं रहेगा. प्रशासन की यह पहल न केवल स्थानीय लोगों के जीवन को बदलेगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में सकारात्मक प्रभाव डालेगी. आलबेड़ा गांव की यह कहानी केवल एक प्रशासनिक दौरे की नहीं है, बल्कि यह विश्वास, साहस और परिवर्तन की कहानी है. अबूझमाड़, जो कभी नक्सलवाद के कारण देश-दुनिया में जाना जाता था, आज विकास और बदलाव की नई कहानी लिख रहा है. आलबेड़ा के ग्रामीणों की आंखों में अब उम्मीद की चमक है. उन्हें विश्वास है कि जैसे आज के दिन कलेक्टर उनके गांव तक पहुंच पाएं हैं, एक दिन विकास भी जरूर पहुंचेगा. यह पहल आने वाले समय में न केवल आलबेड़ा, बल्कि पूरे अबूझमाड़ के लिए एक नई दिशा और नई उम्मीद का प्रतीक बनेगी.
