फूल-पत्तियों से रंग भरा जीवन, समूह की महिलाओं ने दिखाया हुनर
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की महिलाएं अब बिहान योजना से जुड़कर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रही हैं. इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला और मेहनत हो, तो घर बैठे भी कुछ नया कर अलग पहचान बनाई जा सकती है. ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है राधा-कृष्ण समूह की महिलाओं की, जो पिछले छह वर्षों से होली के दिनों में अपने घरों पर अलग-अलग प्रकार के फूलों और पत्तियों से शुद्ध हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं. यह गुलाल पूरी तरह केमिकल-मुक्त होता है, जिसे वे स्थानीय बाजारों में बेचकर अच्छी आय भी अर्जित कर रही हैं. इन महिलाओं की मेहनत और सफलता की कहानी को करीब से जानने के लिए उनसे बातचीत की गई .
छह साल से हर्बल गुलाल बना रहा समूह की महिलाएं
राधे-कृष्ण समूह की महिला से बातचीत में बताया कि उनका समूह पिछले करीब छह सालों से लगातार हर्बल गुलाल बनाने का काम कर रहा है. शुरुआत से ही उन्होंने तय किया कि गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक होगा, ताकि इसे इस्तेमाल करने से त्वचा को कोई नुकसान न पहुंचे.उन्होंने बताया कि हर्बल गुलाल बनाने में गेंदा फूल, चुकंदर, पालक पत्ती, सेमी पत्ती जैसी प्राकृतिक चीजों का उपयोग किया जाता है. इन्हीं से अलग-अलग रंग तैयार किए जाते हैं. फिलहाल उनके पास चेरी फूल, गेंदा फूल और पालक पत्ती उपलब्ध हैं, जिनसे कई रंगों का गुलाल तैयार हो चुका है. समूह कि महिला ने बताया कि होली से करीब एक सप्ताह पहले ही गुलाल बनाने का काम शुरू कर दिया जाता है. इसके बाद लगभग एक महीने तक लगातार निर्माण चलता है, ताकि मांग के अनुसार पर्याप्त गुलाल तैयार किया जा सके. इस पूरे काम में एक ही समूह की महिलाएं मिलकर मेहनत करती हैं.
गुलाल तैयार करने की प्रक्रिया के बारे में बताया कि कुछ चीजों को उबाला जाता है, जबकि कुछ को सुखाकर ग्राइंड किया जाता है. इसके बाद आरारोट पाउडर मिलाया जाता है. फिर मिश्रण को अच्छी तरह सुखाकर दोबारा पीसा जाता है और छन्नी से छानकर तय माप में पैक किया जाता है. यह गुलाल त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। अगर गलती से बच्चों के मुंह में भी चला जाए, तो कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि इसमें किसी तरह का केमिकल नहीं मिलाया जाता. उन्होंने बताया कि पिछले साल जिन लोगों ने यह गुलाल खरीदा था, उनसे आज तक कोई शिकायत नहीं मिली है और वही ग्राहक इस साल भी दोबारा उनसे ही गुलाल खरीद रहे हैं.हर्बल गुलाल में इस्तेमाल होने वाले फूल और पत्तियों की खेती भी समूह की महिलाएं खुद करती हैं. इससे न सिर्फ लागत कम होती है, बल्कि उत्पाद की गुणवत्ता पर भी पूरा नियंत्रण रहता है. आमदनी को लेकर उन्होंने ने बताया कि जितनी पूंजी लगाई जाती है, आमदनी भी उसी अनुपात में होती है. वहीं समूह की दूसरी महिला अंजना मिस्त्री ने बताया कि अगर करीब 50 हजार रुपये की लागत लगाई जाए, तो लगभग डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है. उन्होंने कि एक सर और मैडम ने उन्हें इस काम की ट्रेनिंग दी थी. शुरुआत में करीब एक सप्ताह तक पूरी प्रक्रिया समझाई गई, जिसके बाद महिलाओं ने खुद गुलाल बनाना शुरू कर दिया.
जब उनसे से पूछा गया कि पहले वे क्या करती थीं और अब क्या बदलाव आया है, तो उन्होंने बताया कि पहले वे सिर्फ घर तक सीमित थीं. अब साल में एक बार ही सही, लेकिन जब सभी महिलाएं मिलकर गुलाल बनाती हैं, तो उन्हें अच्छा लगता है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है. ट्रेनिंग मिलने के बाद उन्हें एक नई पहचान मिली. वे कलेक्टर ऑफिस तक गईं, वहां अपने गुलाल को दिखाया और दुकान लगाने की सिफारिश की. जांच के बाद उनके उत्पाद को सही पाया गया. इसके बाद से लोग उन्हें “हर्बल गुलाल” के नाम से पहचानने लगे हैं और आज उनकी मेहनत से पूरे इलाके में उनका नाम जाना जा रहा है.
