सिल्वर स्क्रीन पर अबूझमाड़ बस्तर की वादियों में शूट हो रही फिल्म - CGKIRAN

सिल्वर स्क्रीन पर अबूझमाड़ बस्तर की वादियों में शूट हो रही फिल्म


नक्सली हिंसा और गोलियों, बम धमाकों की शोर के बीच बड़ा होने वाला बच्चा, आज बस्तर की तस्वीर बदलने के लिए जंगल में कदम रख चुका है. बस्तर की धरती से मायानगरी मुंबई तक का सफर तय करने वाला एक बच्चा, आज बस्तर को छॉलीवुड के कैनवास पर बखूबी उतार रहा है. बस्तर से हिंसा और दहशत का कोहरा जैसे-जैसे छंट रहा है, वैसे-वैसे बस्तर की समृद्ध संस्कृति अब देश और दुनिया के सामने आ रही है. हिंसा का कोहरा जैसे-जैसे छट रहा है, वैसे-वैसे बस्तर की छुपी प्रतिभा निखरकर सामने आने लगी है. इन्ही प्रतिभाओं में से एक प्रतिभा हैं दिनेश नाग. अबूझमाड़ का ये माटीपुत्र अब बस्तर की सुंदरता को फिल्मी पर्दों पर फिल्मा रहे हैं. बस्तर के संघर्ष और बस्तर की सुंदरता को फिल्मों के जरिए देश और दुनिया के सामने लाने की तैयारी में जुटे हैं. 

मायानगरी मुंबई से निकलकर दिनेश नारायणपुर के अबूझमाड़ पहुंचे, और शुरू की अपनी 'फिल्म मुरली' की शूटिंग. दिनेश कहते हैं कि पूरा बस्तर ही शूटिंग लोकेशन है, आप कहीं भी चले जाएं यहां की नेचुरल ब्यूटी, यहां के लोग और यहां के माटी की खुशबू सबसे जुदा है. कलाकार दिनेश कहते हैं कि बस्तर की इसी सुंदरता को सामने लाने की कोशिश, मैं फिल्मों के माध्यम से करने में जुटा हूं. दिनेश कहते हैं कि उनकी फिल्म मुरली होली पर रिलीज होने वाली है. छत्तीसगढ़िया फिल्म हमेशा से सामाजिक मुद्दों को लेकर बनती रही है. सामाजिक संदेश देने वाली फिल्मों को लोग खूब पसंद भी करते हैं और सराहते भी हैं. दिनेश नाग कहते हैं उनकी फिल्म मुरली भी सामाजिक संदेश देने का ताना-बाना बुनने वाली फिल्म है. दिनेश कहते हैं कि बस्तर में अब सड़क, स्कूल और अस्पताल की कमी नहीं है. फिल्मों के जरिए जब हम जीवंत बाकी मुद्दों को उठाएंगे तो विकास का पैमाना बड़े स्केल पर लोगों के सामने आएगा, लोग अपनी जरूरतों को सामने रखेंगे. इससे बस्तर के विकास में तेजी से परिवर्तन आएगा. यहां के युवाओं को टैलेंट दिखाने का भी मौका मिलेगा. दिनेश नाग कहते हैं कि बस्तर के युवाओं को बस मार्गदर्शन की जरूरत है. जब यहां के लोगों की सादगी पर्दे पर दिखेगी तो पूरी दुनिया इनकी कायल हो जाएगी. दिनेश कहते हैं कि बस्तर की संस्कृति के बहुत छोटे से हिस्से से हम सब वाकिफ हैं, सिल्वर स्क्रीन पर जब यहां की संस्कृति दिखेगी तब लोगों को पता चलेगा कि यहां की संस्कृति कितनी विशाल और समृद्ध है.

रुपहले पर्दे पर दिखेगी बस्तर की समृद्ध संस्कृति

बस्तर का अबूझमाड़ जंगल जिसका ओर और छोर अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक कोई समझ नहीं पाया. अबूझमाड के अबूझ होने का फायदा अगर किसी ने सबसे ज्यादा उठाया तो वो हैं नक्सली. अबूझमाड़ के जंगल को नक्सलियों ने अपना सेफ जोन बना लिया. दशकों से लोगों के खून बहा रहे माओवादी अब इसी अबूझमाड़ के जंगल में खुद अनसेफ हो चुके हैं. माओवाद जैसे-जैसे बस्तर में सिमटता जा रहा है, वैसे-वैसे बस्तर में बदलाव की तस्वीर नजर आए लगी है. इसी बदलाव का नतीजा है कि अबूझमाड़ के जंगल से गोलियों की आवाज नहीं बल्कि लाइट, कैमरा, एक्शन की आवाज सुनाई पड़ने लगी है. ये विकास की लाउड आवाज है, जिसे कथित रेड कॉरिडोर में बैठे चंद नक्सली भी सुन रहे हैं. उनके सिमटते साम्राज्य पर फिल्मों के जरिए विकास की मजबूत कील ठोकी जा रही है.

  




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