’बारिश अब भी आती है... लेकिन प्रेमचंद के घर में अब डर नहीं उतरता’ प्रधानमंत्री आवास योजना ने दिया पक्का आशियाना - CGKIRAN

’बारिश अब भी आती है... लेकिन प्रेमचंद के घर में अब डर नहीं उतरता’ प्रधानमंत्री आवास योजना ने दिया पक्का आशियाना


बारिश की बूंदें गिरती हैं तो अब प्रेमचंद बाहर निकलकर छत नहीं देखते। न मिट्टी की दीवारों को हाथ लगाकर यह अंदाजा लगाते हैं कि कहीं पानी घर के अंदर तो नहीं आएगा। न घर के किसी कोने में रखे अनाज और सामान को बचाने की चिंता होती है। अब बारिश होती है तो प्रेमचंद बस अपने पक्के घर के भीतर बैठकर उसे देखते हैं। कभी जिस बारिश का इंतजार नहीं, डर रहता था... आज वही बारिश उनके लिए सुकून लेकर आती है।

कोरिया जिले के बैकुण्ठपुर जनपद की ग्राम पंचायत बुढ़ार निवासी 65 वर्षीय प्रेमचंद की जिंदगी में आया यह बदलाव किसी एक दिन की कहानी नहीं है। इसके पीछे करीब छह दशक का संघर्ष है, दूसरों के मवेशी चराते हुए बीता जीवन है और एक ऐसा सपना है, जिसे उन्होंने कभी जोर से कहने की हिम्मत नहीं की-श्काश, मेरा भी एक पक्का घर होता।श्

’जिंदगीभर दूसरों की गाय-भैंस चराईं, अपना घर फिर भी कच्चा रहा’

प्रेमचंद के पिता कंवलसाय भी चरवाहे थे। गांव के लोगों के मवेशी चराकर परिवार का जीवन चलता था। पिता के बाद प्रेमचंद ने भी यही काम संभाल लिया। सुबह निकलना, दिनभर मवेशियों के साथ रहना और शाम को घर लौट आना- इसी दिनचर्या में उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा गुजर गया।

काम मेहनत का था, लेकिन आमदनी सीमित। जितना मिलता, उससे परिवार का पेट चलता। बच्चों की जरूरतें पूरी होतीं। रोजमर्रा का खर्च निकलता। मगर पक्का मकान बनाने के लिए बचत कर पाना संभव नहीं हुआ।दूसरों की गायों के लिए खुली चरागाहें थीं, लेकिन अपने परिवार के लिए सुरक्षित छत का इंतजाम नहीं हो पा रहा था।

’हर बरसात घर में पानी से पहले चिंता दाखिल होती थी’

प्रेमचंद का परिवार लंबे समय तक कच्चे मिट्टी के मकान में रहा। गर्मी किसी तरह कट जाती, सर्दी भी गुजर जाती, लेकिन बरसात आते ही परेशानी बढ़ जाती। छत से पानी टपकने लगता। मिट्टी की दीवारों पर नमी दिखाई देने लगती। घर के सामान को बचाने की चिंता रहती। परिवार के सदस्यों की निगाहें आसमान पर कम और घर की छत पर ज्यादा रहती थीं।

उम्र बढ़ने के साथ प्रेमचंद के मन में एक और चिंता जुड़ गई- मेरे  बाद मेरे परिवार का क्या होगा? ‘बेटा और बहू साथ थे। परिवार था। लेकिन घर ऐसा नहीं था, जिसे वे अपने परिवार की सुरक्षा का भरोसा दे सकें।

फिर एक दिन सूची में आया नाम... और उम्मीद ने दरवाजा खटखटाया प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की हितग्राही सूची में प्रेमचंद का नाम आया तो वर्षों से दबा पड़ा सपना फिर जाग उठा।

आवास स्वीकृत हुआ। योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता की किश्तें समय पर मिलीं। निर्माण शुरू हुआ। शायद प्रेमचंद ने उस समय भी पूरी तरह विश्वास नहीं किया होगा कि यह सपना सच में पूरा हो जाएगा।

लेकिन एक-एक ईंट जुड़ती गई। दीवारें उठती गईं। छत बनी और फिर वह दिन आया, जब प्रेमचंद अपने पक्के घर के सामने खड़े थे।

जिस घर की कल्पना उन्होंने वर्षों तक की थी, वह अब उनके सामने था।यह सिर्फ मकान नहीं था... जिंदगीभर के डर से मुक्ति थी! किसी के लिए पक्का मकान एक सुविधा हो सकता है। प्रेमचंद के लिए यह उससे कहीं अधिक है।यह उस डर से मुक्ति है, जो हर बरसात में उनके साथ घर के भीतर आता था।

यह उस चिंता का जवाब है, जो उम्र के साथ उनके माथे पर गहरी होती जा रही थी। यह उस अधूरे सपने का पूरा होना है, जिसे उन्होंने अपनी सीमित आमदनी के कारण कभी हकीकत में बदलने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी।

अब उनका परिवार पक्की छत के नीचे है। एक घर मिला तो जिंदगी की कई परेशानियां भी कम हुई। प्रेमचंद के परिवार को शासन की अन्य योजनाओं का भी लाभ मिला है। स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण के अंतर्गत व्यक्तिगत शौचालय मिलने से परिवार को स्वच्छ और सुरक्षित सुविधा मिली।

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिलने से रसोई में धुएं से राहत मिली। परिवार की महिलाओं के लिए खाना बनाना पहले की तुलना में आसान और सुरक्षित हुआ। योजनाओं का यह लाभ प्रेमचंद के परिवार के लिए अलग-अलग सुविधाएं नहीं, बल्कि बेहतर जिंदगी की जुड़ती हुई कड़ियां बन गया।

’अब बारिश होती है तो घर की चिंता नहीं होती’

प्रेमचंद अपने नए घर को देखते हुए कहते हैं-‘मैंने जिंदगीभर चरवाहे का काम किया। जितना कमाया, परिवार चलाने में खर्च हो गया। अपना पक्का घर बना पाऊंगा, ऐसा कभी नहीं लगा था। पहले बारिश में बहुत चिंता होती थी। अब पक्का घर है तो मन को तसल्ली रहती है कि मेरा परिवार सुरक्षित है।‘

उनकी आवाज में कोई बड़ी बात कहने का अंदाज नहीं है। यह किसी भाषण का हिस्सा भी नहीं है। यह एक ऐसे बुजुर्ग की सहज बात है, जिसने जिंदगी का बड़ा हिस्सा अभाव में गुजारा है और अब पहली बार अपने घर को देखकर संतोष महसूस कर रहा है।

’65 साल की उम्र में मिला अपना ‘पक्का घर’

प्रेमचंद की कहानी में सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि सपना देर से पूरा हुआ, लेकिन पूरा हुआ। 65 साल की उम्र में उन्हें वह मिला, जिसका इंतजार शायद उनकी जिंदगी के सबसे लंबे हिस्से ने किया था।

आज उनके घर की पक्की दीवारें सिर्फ ईंट और सीमेंट से नहीं बनी हैं। इनमें उन वर्षों की मेहनत भी जैसे दिखाई देती है, जो उन्होंने चरवाहे के रूप में बिताए। इनमें उन बरसातों की याद भी है, जब वे परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहे। और इनमें उस उम्मीद की कहानी भी है, जिसने उन्हें आखिरकार एक सुरक्षित आशियाना दिया।

अब प्रेमचंद के घर की छत सिर्फ बारिश रोकती है। उसके नीचे रहने वाले परिवार के सपनों को भी सहारा देती है और शायद इसी का नाम है ‘प्रधानमंत्री आवास योजना‘ जो किसी परिवार की जिंदगी में सचमुच उतर जाना।

कलेक्टर श्रीमती रोक्तिमा यादव ने कहा कि शासन की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम पंक्ति में रहने वाले लोगों तक पहुंचे और उसका लाभ उन पात्र हितग्राहियों को मिले ताकि उनकी जीवन में सुखद बदलाव आ सके। प्रेमचंद जैसे सैकड़ो हितग्राहियों को लाभ देने के लिए प्रशासन प्रयासरत हैं।उन्होंने कहा हमारा प्रयास है कि तमाम योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचे औऱ उसका लाभ पात्र हितग्राही ले सके।

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