बदलता अबूझमाड़- नक्सलवाद खात्मे के बाद आजादी का पहला जश्न, शान से लहरा रहा तिरंगा
कभी नक्सलियों के लिए गढ़ माना जाने वाले अबूझमाड़ में हालात अब बदल रहे हैं। तस्वीरें सिर्फ अबूझमाड़ की नहीं है, ये तस्वीरें उस बदलाव की हैं, जिसकी कल्पना कभी बेहद मुश्किल मानी जाती थी. ये वही अबूझमाड़ है, जहां कभी नक्सलवाद के साये में राष्ट्रीय पर्वों का उत्साह दबा हुआ नजर आता था, लेकिन आज उसी धरती पर तिरंगा शान से लहरा रहा है. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अबूझमाड़ के बेहद अंदरूनी और दुर्गम गांवों में BSF का ‘हर घर तिरंगा’ अभियान पहुंचा. 129वीं वाहिनी BSF के जवानों ने कोरोस्कोडो, हचेकोटी, अदनार, मरकाबेड़ा और आसपास के गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों और बच्चों को तिरंगा सौंपा, और फिर जो तस्वीर सामने आई वो बदलते अबूझमाड़ की कहानी कहने के लिए काफी है. अबूझमाड़ में यह बदलाव किसी एक दिन में नहीं आया. सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी, ग्रामीणों के साथ संवाद और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच ने धीरे-धीरे विश्वास का माहौल तैयार किया है. ‘हर घर तिरंगा’ अभियान इसी बदलते रिश्ते की एक झलक है.
अबूझमाड़ के दुर्गम इलाकों में लहराया तिरंगा
घने जंगलों के बीच बसे गांव, चारों तरफ पहाड़ियां, दुर्गम रास्ते और उन्हीं रास्तों से होकर जब BSF के जवान गांवों तक पहुंचे, तो उनके हाथों में हथियारों के साथ एक और संदेश था, राष्ट्र की एकता और तिरंगे के सम्मान का संदेश. जवानों ने ग्रामीणों और बच्चों को राष्ट्रीय ध्वज बांटे, चॉकलेट और बिस्किट बांटे. बच्चों के चेहरों पर उत्साह था और ग्रामीणों के हाथों में तिरंगा. कोरोस्कोडो से लेकर हचेकोटी,अदनार से मरकाबेड़ा तक ग्रामीणों ने पूरे सम्मान के साथ तिरंगा अपने हाथों में लिया और अपने घरों पर फहराया.
किसी के हाथ में तिरंगा था, किसी के चेहरे पर मुस्कान, और किसी की आवाज में देशभक्ति का जोश. अबूझमाड़ की इन तस्वीरों में एक संदेश साफ दिखाई दे रहा था-भारत का तिरंगा अब उन इलाकों तक भी पहुंच रहा है, जहां कभी पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था. अबूझमाड़ के इन इलाकों का अतीत भी इस तस्वीर को और खास बनाता है. एक समय था जब नक्सल गतिविधियों के प्रभाव के कारण इन क्षेत्रों में राष्ट्रीय पर्वों को लेकर भय और प्रतिबंध का माहौल रहा. राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक व्यवस्था के विरोध की घटनाएं भी सामने आती रही हैं. लेकिन आज तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है. जहां कभी लाल सलाम की गूंज सुनाई देती थी, वहीं आज तिरंगे के सम्मान में देशभक्ति के नारे गूंज रहे हैं.
अबूझमाड़ की पहचान लंबे समय तक उसकी दुर्गमता और नक्सल प्रभाव से जुड़ी रही. लेकिन आज इसी अबूझमाड़ में विकास, सुरक्षा, विश्वास और राष्ट्रभावना की नई तस्वीरें दिखाई देने लगी हैं. घने जंगलों के बीच लहराता तिरंगा मानो यह संदेश दे रहा है कि देश की मुख्यधारा से कोई इलाका हमेशा के लिए दूर नहीं रह सकता. दुर्गम पहाड़ियों के बीच फहराता हर तिरंगा उन लोगों के विश्वास का प्रतीक बन रहा है, जो अब अपने गांव, अपने क्षेत्र और अपने देश के भविष्य को नए नजरिए से देख रहे हैं.
BSF की यह पहल केवल स्वतंत्रता दिवस का एक कार्यक्रम नहीं है. यह उस विश्वास को मजबूत करने की कोशिश है, जिसमें सुरक्षा बल और स्थानीय समुदाय एक-दूसरे के करीब आएं. शांति हो विकास हो,शिक्षा हो, बेहतर सुविधाएं हों और सबसे बढ़कर, दूरस्थ इलाकों के लोगों का देश के साथ जुड़ाव और मजबूत हो. अबूझमाड़ में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान इसी विश्वास को आगे बढ़ाता नजर आया.
अबूझमाड़ की ये तस्वीरें बहुत कुछ कह रही है. एक तरफ वही घने जंगल हैं, वही दुर्गम पहाड़ियां है, वही गांव हैं, लेकिन माहौल बदला नजर आ रहा है. कभी जिस अबूझमाड़ को नक्सलवाद के साये के लिए जाना जाता था, आज उसी अबूझमाड़ में तिरंगा सम्मान के साथ लहराता दिखाई दे रहा है. ग्रामीणों के हाथों में तिरंगा और बच्चों की आंखों में उत्साह इस बात का संकेत है कि अबूझमाड़ में भय की जगह विश्वास और अलगाव की जगह जुड़ाव अपनी जगह बना रहा है.
यह सिर्फ ‘हर घर तिरंगा’ अभियान नहीं बल्कि बदलते अबूझमाड़ की तस्वीर है. नक्सलवाद के साये से तिरंगे की शान तक अबूझमाड़ में राष्ट्रभक्ति के इस नए अध्याय के साथ संवरते बस्तर की एक नई तस्वीर सामने आ रही है.
