छत्तीसगढ़ में पारंपरिक खेती को बढ़ावा - किसान कर रहे शकरकंद की खेती से बढ़िया कमाई
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाकों में आज भी पारंपरिक खेती और खान-पान को जीवित रखा जा रहा है. यहां के लोग अपनी प्राचीन और समृद्ध परंपराओं को सहेजने में लगातार जुटे हुए हैं. इसी पारंपरिक कड़ी में इलाके के एक स्थानीय किसान ने शकरकंद की बेहतरीन खेती की है. स्थानीय भाषा में शकरकंद को मुख्य रूप से ‘कांदा’ कहा जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है. यह फसल लाल और सफेद दो अलग-अलग प्रकार की होती है, जिसे आमतौर पर भाप में अच्छी तरह पकाकर ही खाया जाता है.
पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले जागरूक किसान दौलत ने इस विशेष खेती के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है. किसान दौलत ने बताया कि शकरकंद की अच्छी खेती के लिए सबसे पहले पूरे खेत में मेड़ तैयार की जाती है. इसके बाद खेत में खाद डाली जाती है. खाद डालने की इस प्रक्रिया के बाद शकरकंद की बेल या ‘नार’ को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में बिछा दिया जाता है. फिर इसके ठीक ऊपर से हल्की मिट्टी डालकर दबा दिया जाता है. ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने लगभग आठ दिन पहले ही इसकी व्यवस्थित खेती शुरू की है. इस स्वादिष्ट फसल की खुदाई दिवाली के बाद की जाएगी.
ग्रामीण इलाकों में शकरकंद की लाल और सफेद दोनों ही किस्में मुख्य रूप से पाई जाती हैं. इस फसल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके पौधे के विकास के लिए बहुत अधिक मेहनत करने की आवश्यकता नहीं होती है. ग्रामीण बताते हैं कि यह बेहद लचीली फसल है. यदि शकरकंद की बेल कहीं भी खाली जगह पर पड़ी रह जाए, तो कई बार वहीं से नया पौधा स्वतः ही निकल आता है.
गांवों में शकरकंद का उपयोग विशेष रूप से प्रमुख त्योहारों के दौरान किया जाता है. देवठन के त्योहार के पावन अवसर पर इसे ‘कांदा’ के रूप में खाया जाता है. ग्रामीण बताते हैं कि वे साल में एक-दो बार इसे खाने के लिए जरूर उगाते हैं. कई परिवार ऐसे भी हैं जो इसे बाजार में बेचने के बजाय केवल अपने उपभोग यानी खुद खाने के लिए ही खेतों में उगाते हैं. ग्रामीण शकरकंद को अलग-अलग तरीकों से खाते हैं. इसे सब्जी के रूप में पकाने के बजाय भाप में पकाकर खाना ग्रामीण इलाकों में अधिक पसंद किया जाता है. किसान दौलत के अनुसार, भाप में पकाने के बाद इसका स्वाद प्राकृतिक रूप से मीठा और स्वादिष्ट लगता है. शकरकंद की खेती और इसके उपयोग की यह बहुमूल्य जानकारी उन्हें गांव के बुजुर्गों से मिली है. बुजुर्गों ने ही उन्हें पारंपरिक खान-पान और खेती के ये शानदार तरीके सिखाए हैं.
