75 दिनों तक गूंजेगी बस्तर की लोकपरंपरा, पाट जात्रा के साथ ऐतिहासिक दशहरा पर्व शुरुआत
छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की शुरुआत हो गई है। हरेली अमावस्या के मौके पर बुधवार 12 अगस्त को जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में बस्तर दशहरा की पहली और महत्वपूर्ण रस्म पाट जात्रा विधि-विधान के साथ पूरी की गई। इसी के साथ करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस अनोखे पर्व की औपचारिक शुरुआत हो गई है। पाट जात्रा के दौरान मंदिर परिसर में पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे और बस्तर की सदियों पुरानी संस्कृति और परंपरा की झलक देखने को मिली। अब आने वाले दिनों में बस्तर दशहरा की अन्य महत्वपूर्ण रस्में भी क्रमवार पूरी की जाएंगी। बस्तर दशहरा को देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले दशहरा पर्वों में गिना जाता है। करीब 600 साल पुरानी यह परंपरा आज भी अपनी मूल संस्कृति और रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है। इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि यहां दशहरा सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं होता, बल्कि करीब 75 दिनों तक अलग-अलग पारंपरिक रस्मों के साथ चलता है। इस दौरान 12 से ज्यादा प्रमुख रस्में निभाई जाती हैं, जो बस्तर की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई हैं।
करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस बड़े आयोजन को व्यवस्थित तरीके से पूरा कराने के लिए प्रशासन की ओर से विशेष समिति का गठन किया जाता है। यह समिति पर्व की अलग-अलग रस्मों और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालती है। प्रशासन की कोशिश रहती है कि सदियों पुरानी परंपराओं को उसी मूल स्वरूप में आगे बढ़ाया जाए और आयोजन के दौरान आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को किसी तरह की परेशानी न हो।
12 अगस्त से 27 अक्टूबर तक होंगी प्रमुख रस्में
बस्तर दशहरा के दौरान 24 सितंबर को डेरी गड़ाई, 10 अक्टूबर को काछनगादी, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई की रस्म होगी। 13 से 18 अक्टूबर तक नवरात्रि पूजा एवं रथ परिक्रमा का आयोजन किया जाएगा।
18 अक्टूबर को बेल पूजा, 19 अक्टूबर को महाअष्टमी एवं निशा जात्रा, जबकि 20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा, जोगी उठाई और मावली परघाव की रस्में होंगी। 21 अक्टूबर को भीतर रैनी और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा आयोजित होगी।
मुरिया दरबार से लेकर मावली माता की विदाई तक
23 अक्टूबर को काछन जात्रा के बाद ऐतिहासिक मुरिया दरबार आयोजित होगा। 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा के माध्यम से ग्राम्य देवी-देवताओं की विदाई होगी। इसके बाद 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई पूजा विधान के साथ पर्व का औपचारिक समापन होगा।
मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सदियों पुरानी रस्मों के लिए देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। यह पर्व बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकजुटता का जीवंत प्रतीक है।
