अनोखी है मांझी समाज की होली ‘चूहाना’ की रस्म और नदी किनारे निकासी - CGKIRAN

अनोखी है मांझी समाज की होली ‘चूहाना’ की रस्म और नदी किनारे निकासी


छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला में आज भी कई समुदाय पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होली का पर्व मनाते हैं. इन्हीं में से एक है मांझी समाज, जिसकी होली मनाने की परंपरा बाकी समाजों से बिल्कुल अलग और अनूठी है. मांझी समाज में होलिका दहन के दौरान लकड़ी या उपलों की जगह सेमर गेडा गाड़ा जाता है. सेमर गेडा को झोपड़ी नुमा आकृति देकर विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता है. दहन के बाद सेमर गेडा को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर प्रसाद के रूप में समाज के लोगों में वितरित किया जाता है. होली के अगले दिन सुबह मांझी समाज के लोग अपनी परंपरा के अनुसार इष्ट देव को हड़िया दारू का भोग अर्पित करते हैं. इसके बाद रंग-गुलाल के साथ होली खेली जाती है. वहीं, होली पर्व समाप्त होने के बाद समाज के लोग नदी किनारे जाकर निकासी की परंपरा निभाते हैं.आज भी मांझी समाज की यह परंपरा सरगुजा की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है.

सेमर गेडा से शुरू होती है होलिका दहन की परंपरा

सुक्खू माझी ने बताया कि मांझी समाज में होलिका दहन की परंपरा विशेष विधि से निभाई जाती है. सबसे पहले जंगल से सेमर का गेडा लाकर गांव में गाड़ा जाता है. इसके बाद जमीन खोदकर उसमें अंडा रखा जाता है और सेमर गेडा के चारों ओर झोपड़ी जैसी आकृति बनाई जाती है. फिर उसके नीचे मुर्गी चढ़ाई जाती है और अंत में सेमर गेडा में आग लगाई जाती है. होलिका दहन के बाद सेमर गेडा को काटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटा जाता है. ये टुकड़े गांव के सभी लोगों को प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं. इन्हें खाया नहीं जाता, बल्कि लोग अपने घरों में सुरक्षित रख लेते हैं, जिसे शुभ माना जाता है.

तीन दिन तक चलता है होली का उत्सव

माझी समाज में होलिका दहन के अगले दिन सुबह से ही होली खेलना शुरू हो जाता है. दिनभर रंग-गुलाल उड़ते हैं और घरों में पारंपरिक हड़िया दारू का सेवन किया जाता है. दूसरे और तीसरे दिन भी होली खेलने की परंपरा रहती है. इसके बाद होली की निकासी की जाती है, जिसमें रंग-गुलाल को नदी पार किसी पेड़ के नीचे विसर्जित कर दिया जाता है.

सामूहिक होलिका दहन और चूहाना की रस्म 

महाजन ने बताया कि रात के समय सभी लोग मिलकर लकड़ियां इकट्ठा करते हैं और सामूहिक रूप से होलिका दहन किया जाता है. इसके बाद सुबह होली खेली जाती है. हड़िया दारू और अन्य पारंपरिक वस्तुओं से देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है, जिसे ‘चूहाना’ कहा जाता है. इसके बाद आपसी प्रेम और भाईचारे के साथ होली मनाई जाती है. दशरथ ने बताया कि मांझी समाज में होलिका दहन के दिन सुबह सेमर का गेडा काटकर लाया जाता है. इसके बाद हर घर में त्योहार मनाया जाता है. कुछ लोग मुर्गा, तो कुछ लोग बकरा की बलि देते हैं. शाम को सभी लोग होलिका दहन स्थल पर एकत्र होकर आग जलाते हैं, जहां नाच-गान भी होता है.

देव दूल्हा, महादेव और बूढ़ा देव की पूजा

होली के अवसर पर देव दूल्हा, महादेव और बूढ़ा देव की विशेष पूजा की जाती है. सुबह से ही होली खेलने की शुरुआत हो जाती है. लोग खाना-पीना करते हैं, हड़िया दारू पीते हैं और एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक जाकर रंग लगाते हैं. इस दौरान भाईचारे और पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक साफ दिखाई देती है.

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