हरी खाद की खेती से बढ़ रही मिट्टी की उर्वरता, घट रही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता - CGKIRAN

हरी खाद की खेती से बढ़ रही मिट्टी की उर्वरता, घट रही रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता


छत्तीसगढ़ शासन के निर्देशानुसार कृषि विभाग द्वारा किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से हरी खाद के उपयोग को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी क्रम में विकासखंड उदयपुर के ग्राम केशगंवा के प्रगतिशील किसान श्री नरेंद्र सिंह ने अपने लगभग 4 एकड़ कृषि क्षेत्र में ढेंचा (हरी खाद) की फसल लगाकर उसे मचाई (मिट्टी में पलटने) का कार्य किया है। इसके बाद वे इसी खेत में धान की खेती करेंगे।

खेत में ही तैयार हो रही जैविक खाद

किसान श्री नरेंद्र सिंह ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने तथा मिट्टी की उर्वराशक्ति को प्राकृतिक रूप से बढ़ाने के उद्देश्य से कृषि विभाग द्वारा उन्हें ढेंचा की खेती करने की सलाह दी गई। उन्होंने बताया कि फूल आने की अवस्था से पहले ढेंचा को खेत में पलट देने से यह कुछ ही समय में सड़कर जैविक खाद में परिवर्तित हो जाती है, जिससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्व स्वाभाविक रूप से उपलब्ध हो जाते हैं।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार ढेंचा, दलहनी जैसे हरी खाद की फसलें वायुमंडल से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी में उपलब्ध कराती हैं। इसके साथ ही फास्फोरस, जिंक एवं आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है, जिससे आगामी फसल का बेहतर विकास होता है।

हरी खाद के उपयोग से मिट्टी की संरचना में भी सुधार होता है। ढेंचा के सड़ने से बनने वाला ह्यूमस मिट्टी को भुरभुरा बनाता है, जिससे उसमें हवा एवं पानी का संचार बेहतर होता है। इसके कारण जड़ों का विकास सुचारु रूप से होता है तथा फसल अधिक स्वस्थ एवं उत्पादक बनती है।

हरी खाद मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जैविक पदार्थ स्पंज की तरह कार्य करते हुए मिट्टी में नमी को लंबे समय तक बनाए रखते हैं, जिससे सिंचाई की आवश्यकता कम होती है और फसल को सूखे की स्थिति में भी लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त ढेंचा की सघन वृद्धि खेत को प्राकृतिक रूप से ढक लेती है, जिससे खरपतवारों की वृद्धि नियंत्रित होती है। 

कृषकों से हरी खाद उपयोग की अपील

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे धान सहित अन्य फसलों की बुवाई से पहले ढैंचा, सनई अथवा अन्य उपयुक्त हरी खाद वाली फसलों का उपयोग कर मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाएं। हरी खाद न केवल रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च को कम करती है, बल्कि भूमि की दीर्घकालीन उर्वराशक्ति बनाए रखते हुए टिकाऊ एवं लाभकारी कृषि को भी बढ़ावा देती है।

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