धान की ‘चोपी’ खेती : कम लागत, कम मजदूरी और बेहतर उत्पादन... कमाल की है यह पारंपरिक तकनीक
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाके में धान रोपाई कि पारंपरिक विधि के साथ आज भी पुरानी तकनीक चोपी से लोग खेती करते हैं, जिसमें किसानों को कम समय में अधिक मुनाफा मिल सकता है. बैल के साथ चोपी करने से दाने खेत में नही के बराबर गिरते हैं लेकिन अगर ट्रैक्टर से करे तो थोड़ा गिरता है यानी रोपाई विधि से कही जायदा बेहतर चोपी से किसानों को लाभ मिलेगा यह तकनीक कम बारिश, कम खर्च और अधिक मुनाफे के कारण आज भी किसानों के लिए लाभदायक मानी जाती है.
सरगुजा अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में धान की पारंपरिक ‘चोपी’ खेती आज भी किसानों के बीच लोकप्रिय है, स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति ने बताया कि पहले लगभग सभी किसान इसी विधि से धान की खेती करते थे, समय के साथ रोपा पद्धति का चलन बढ़ा, लेकिन कम लागत और बेहतर उत्पादन के कारण अब भी कई किसान चोपी को प्राथमिकता देते हैं.
कैसे तैयार किया जाता है चोपी का खेत?
सिकंदर प्रजापति के अनुसार सबसे पहले खेत में पर्याप्त पानी भरकर हल या ट्रैक्टर से अच्छी तरह जुताई की जाती है, इसके बाद पाटा चलाकर मिट्टी को पूरी तरह मुलायम और समतल बनाया जाता है. दूसरी ओर धान के बीजों को तीन से पांच दिन पहले पानी में भिगोकर बोरे में रखा जाता है, जिससे उनमें अंकुर निकल आते हैं.अंकुरित बीजों को तैयार खेत में सीधे बिखेरकर बो दिया जाता है.
कम खर्च, खरपतवार पर नियंत्रण
सिकंदर ने बताया कि चोपी खेती में रोपा की तुलना में मजदूरी और खर्च काफी कम आता है,एक बार बुवाई करने के बाद खरपतवार भी बहुत कम उगते हैं, क्योंकि कीचड़ में अधिकांश घास दब जाती है. इससे धान का विकास बेहतर होता है और किसानों को अच्छी गुणवत्ता के साथ अधिक उत्पादन मिलता है.
कम बारिश में भी फायदेमंद तकनीक
सिकंदर प्रजापति का कहना है कि यदि बारिश सामान्य से कम हो तो भी हल्की वर्षा के बाद चोपी विधि से बुवाई की जा सकती है. खेत की मेड़बंदी होने से पानी लंबे समय तक खेत में बना रहता है, जिससे फसल को पर्याप्त नमी मिलती है और उत्पादन प्रभावित नहीं होता है.
तीन से चार दिन में तैयार होती है खेत की तैयारी
चोपी के लिए खेत तैयार करने में लगभग तीन से चार दिन का समय लगता है. उचित खाद और देखभाल के साथ किसान एक कट्टा बीज से करीब 20 कट्टा तक उत्पादन मिलने का दावा करते हैं.यही वजह है कि कम बजट वाले किसानों के लिए यह तकनीक काफी लाभदायक मानी जाती है.
बैल से खेती को बताया ज्यादा उपयुक्त
सिकंदर ने बताया कि चोपी खेती बैल और ट्रैक्टर दोनों से की जा सकती है, लेकिन बैल से जुताई अधिक उपयुक्त मानी जाती है. ट्रैक्टर अधिक गहराई तक मिट्टी को पलट देता है, जिससे अधिक गीली जमीन में धान का बीज नीचे दब सकता है. वहीं बैल से हल्की जुताई होने के कारण बीज सही गहराई पर रहता है और अंकुरण बेहतर होता है…
किसानों को दी चोपी अपनाने की सलाह
स्थानीय जानकार सिकंदर प्रजापति ने किसानों से अपील की है कि कम बारिश और सीमित बजट की स्थिति में चोपी विधि अपनाएं. उनका कहना है कि यह पारंपरिक तकनीक आज भी किसानों के लिए कम लागत में बेहतर और सुरक्षित उत्पादन का प्रभावी विकल्प है.
