राष्ट्रीय बालिका दिवस- बेटियां बन रहीं सशक्त, अब लड़कियां भविष्य का नेतृत्व करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार
एक सशक्त राष्ट्र की नींव एक स्वस्थ बेटी ही रख सकती है. दुनिया भर में हर दिन, बालिकाएं एक ऐसे विजन की दिशा में काम कर रही हैं जिसमें वे सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त हों, लेकिन वे इसे अकेले हासिल नहीं कर सकतीं. समाज में लड़कियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालने के लिये हर साल 24 जनवरी के दिन राष्ट्रीय बालिका दिवस यानी National Girl Child Day मनाया जाता है. 24 जनवरी 1966 का दिन आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है. उस दिन दिल्ली के रायसीना हिल्स पर राजनीतिक हलचल अपने चरम पर थी. दृढ़ संकल्प और अटूट आत्मविश्वास से भरी एक महिला भारत के सर्वोच्च पद की शपथ लेने जा रही थी. यह थीं इंदिरा गांधी उस दिन दुनिया ने देखा कि भारत की एक बेटी न केवल घर संभाल सकती है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व भी कर सकती है.
आज की बेटी केवल चूल्हा-चौका तक सीमित नहीं है. वह कोडिंग कर रही है, रोबोटिक्स सीख रही है, और अंतरिक्ष के सपने देख रही है. 'उड़ान' जैसी परियोजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों की मेधावी लड़कियों को इंजीनियरिंग की राह दिखाई है. हालांकि एसटीईएम (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) में अभी केवल 18 प्रतिशत लड़कियां हैं, लेकिन 'एआई फॉर ऑल' जैसे अभियानों से यह दूरी तेजी से सिमट रही है. 2026 के भारत में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) केवल लड़कों का तक सीमित नहीं रह गया है. 'सुकन्या समृद्धि योजना' के 4.53 करोड़ से अधिक खाते इस बात का प्रमाण हैं कि अब बेटी की शादी और पढ़ाई माता-पिता के लिए 'बोझ' नहीं, बल्कि एक 'नियोजित निवेश' है. 8.2 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ, यह योजना बेटियों को उनकी वयस्कता की दहलीज पर एक मजबूत वित्तीय ढाल दे रही है. बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वावलंबन सरकार की पहली प्राथमिकता है. बेटियों के सशक्तिकरण के लिये प्रदेश में अनेक योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन किया जा रहा है, और बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है.
इसी ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2008 में 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस' के रूप में घोषित किया. वर्ष 2026 में प्रवेश के साथ यह दिन अब केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं रह गया है, बल्कि देश की करोड़ों बालिकाओं के सपनों, आत्मविश्वास और संभावनाओं के उत्सव का प्रतीक बन चुका है.
यदि आंकड़ों की बात करें तो देश ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है. एक समय था जब लिंगानुपात गिरकर 927 तक पहुंच गया था, जो गंभीर चिंता का विषय था. लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नवीनतम आंकड़े आशा जगाते हैं. आज भारत में प्रति एक हजार पुरुषों पर 1020 महिलाओं का अनुपात दर्ज किया गया है, जो सामाजिक सोच में आ रहे सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है. हालांकि, चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. 'जन्म के समय लिंगानुपात' अब भी 930 के आसपास है.
क्यों मनाया जाता है यह दिवस?
इस दिन को मनाने का उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों को बढ़ावा देना और लैंगिक भेदभाव को खत्म करना है. इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना भी है. इसका उद्देश्य बालिकाओं को महत्व देने वाला एक सकारात्मक वातावरण के निर्माण में पूरे राष्ट्र को शामिल करना है. इसके साथ ही यह दिवस देश भर में बालिकाओं को सशक्त बनाने और उनके लिए समाज में सुरक्षित माहौल बनाने की ज़रूरत की याद दिलाता है.
अब लड़कियां रूढ़िवादिता और बहिष्कार द्वारा उत्पन्न सीमाओं और अवरोधों को तोड़ रही हैं, जिनमें दिव्यांग बच्चों और हाशिए के समुदायों में रहने वाले बच्चों के लिए निर्धारित सीमाएं और अवरोध भी शामिल हैं. उद्यमी, नवोन्मेषक और वैश्विक आंदोलनों के सर्जक के रूप में, लड़कियां एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर रही हैं जो उनके और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रासंगिक है. अब समय आ गया है कि लड़कियों और बालिकाओं की बात सुनी जाए, ऐसे सिद्ध समाधानों में निवेश किया जाए जो भविष्य की ओर प्रगति को गति देंगे, जिसमें हर लड़की अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर सकेगी.
